सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

फ़रवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुख का स्थान

जब इस सृष्टि की रचना हुई तब हमारी यह पृथ्वी भी सूर्य की ही भांति अग्नि का एक तपता हुआ गोला थी। इस तथ्य पर विज्ञान की सम्मति है। जिस बात को विज्ञान प्रमाणित कर देता है उस बात को तब तक नकार पाना असंभव है जब तक कि विज्ञान ही उसे अप्रमाणित ना कर दे। इस बात पर भी प्राय सर्व सहमति है कि विज्ञान इस विश्व को पश्चिम की देन है। विज्ञान हमारी प्रकृति के भौतिक पक्ष का संश्लेषण और विश्लेषण करके प्राप्त हुए ज्ञान को हमारे समक्ष रखता है। हमारी ज्ञान परंपरा तो आधुनिक विज्ञान से अत्यधिक प्राचीन है। यद्यपि पंडित जवाहरलाल नेहरु भी डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखते हुए मैक्स मूलर आदि पश्चिमी विचारको के तर्कों के सामने धोखा खा गए। वह भी हमारी ज्ञान परंपरा की प्राचीनता को नहीं जान सके। वें आर्यों का आगमन पश्चिमी दिशा से मानते हैं और वह भी ईसा से लगभग 1000 वर्ष पूर्व। किंतु हमारी वैदिक रचनाएं इस कालक्रम से अत्यंत प्राचीन है तथा उस पर कोई भी यूरोपियन छाप नहीं है। इसलिए यह कहना सर्वथा गलत है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं है अपितु बाहर से आए हैं। आर्य सभ्यता का विकास पूरी तरह से भारत में ही हुआ। यदि पंडित नेहरू म...