सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

नवंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

प्राचीन व महान कौन?अरस्तू या मनु ?

किसी भी देश के उत्थान में वहाँ की शिक्षा का अमूल्य योगदान होता है।भारत जैसा देश अपनी महान शैक्षिक परम्परा पर गर्व कर सकता है, किन्तु भारत में अपनी शिक्षा की उपेक्षा करके पाश्चात्य शिक्षा की नींव पर उत्थान के सपने देखना बड़ा हास्यस्पद है। नवीन खोजों के लिए हम प्रायः पाश्चात्य विद्वानों का अनुसरण करके ही आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अपने विद्वानों पर से तो जैसे विश्वास ही उठ गया है।यही प्रेरणा हम अगली पीढ़ी को दे रहें हैं। किसी विषय के मूल को पढ़ाते हुए भी हम अपने विद्यार्थियों को अपने विद्वानों और उनके अनुसन्धान के विषय में बताना पसन्द नही करते।क्या अपनों का अनादर करके विकसित होने पर हम सन्तुष्टि का अनुभव कर सकते है? जीवविज्ञान में बचपन से हम जीवों के वर्गीकरण के विषय में पढ़ते थे। हमें कभी पता नही चला कि इस विषय में भारतीय मनीषियों का भी कोई योगदान है।आज भी आप विकिपीडिया उठाकर देख लीजिए किसी भारतीय का नाम उसमे नही मिलेगा । एक उदाहरण विकिपीडिया से नकल करके दे रहा हूँ-- ग्रीस के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपॉक्रेटीज (Hippocrates, 46-377 ई. पू.) ने और डिमॉक्रिटस (Democritus, 465-370 ई...

दुःख , योग और हिन्दू

प्रायः ईश्वर की बनाई इस दृष्टि को दुःख का पर्याय माना जाता है। दुःख का कारण है अज्ञान,और इस अज्ञान को दूर करने के विभिन्न मार्ग दर्शन या शास्त्र के नाम से विख्यात हैं। मुख्यतः दुःख के तीन प्रकार के माने गये हैं-- 1)आधिभौतिक 2)आधिदैविक और 3)आधिदैहिक आधिभौतिक दुःख उन्हें कहा जाता है जिनका कारण भौतिक अथवा प्राकृतिक हो। जैसे भीषण गर्मी या भयंकर ठण्ड पड़ना, अतिवृष्टि व बाढ़ में सब कुछ तबाह हो जाना, भूकम्प में सब प्रकार की सम्पत्ति का नष्ट हो जाना, सुनामी आना, बादल फटना आदि आदि। इन आपदाओं को दृढ़ मन से सहन ही करना पड़ता है इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही होता। आधिदैविक दुःख में हमारे मन बुद्धि और अहंकार को चोट पहुँचती है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, आसक्ति,आशा, तृष्णा आदि इस दुःख के कारण है; और इन सब का मूल अज्ञान है। तीसरा है आधिदैहिक दुःख; शरीर में चोट लगना, फोड़े फुंसी होना, ज्वर आना, एलर्जी होना अर्थात किसी भी प्रकार के शारीरिक रोग। आधिदैहिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए हम प्रायः किसी डॉक्टर ,वैध या हकीम के पास दौड़ते हैं। अब प्रश्न यह है कि इन दुःखों के मूल कारण अज्ञान को क्या हम दूर करने का प...

वस्त्र और वैराग्य

भारत में वेदों पर आस्था रखने वाले आस्तिक दार्शनिक विचारधाराएं हों या जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसी नास्तिक विचारधाराएं हो;सभी में जीवन के साथ साथ मृत्यु और मृत्यु के उपरांत, दोनों स्थितियों को अपने अपने चश्मे से देखा है तथा मानव का परमशुभ जीवन से परे मृत्यु के उपरांत ही खोजा है।किन्तु उस परमशुभ तक पहुँचने के लिए प्रयत्न सभी जीवन में ही करने है। सबसे पहला प्रयत्न है मन का अनासक्त होना और जीवन में वैराग्य होना। किन्तु वैराग्य को सनातनी महापुरुषों ने कर्तव्य के साथ जोड़ा है और नास्तिक दर्शनकारों ने कर्तव्यच्युत होने को ही वैराग्य समझा है। शायद यही कारण है कि सनातनी राजा हरिश्चंद्र हो, जनक हो, राम हो या महायोगी श्रीकृष्ण हो; ये लोग अपने सनातनी कर्तव्यों से कभी नही भागे अपितु गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी का जीवन जिया । किन्तु बुद्ध और महावीर ने वैराग्य मि ज्वाला मन में जलते ही सर्वप्रथम गृहत्याग किया । सम्भवतः सुपात्र व्यक्तियों को योग्य गुरु न मिलने के कारण ऐसा हुआ। वेदों से दूरी भी इनके भटकाव का कारण बनी। किन्तु कहते है कि लक्ष्य वही पता है जो घर से निकलता है। घर में पड़े हुए व्यक्ति को लक्ष...

धर्म का अध्ययन क्यों ?

बाबा रामदेव की सभा लगी थी। उसमें एक MBBS किये हुए डॉक्टर बैठे थे। अतीत में बाबा के कटु आलोचक थे। समझदार थे। उन्होंने निश्चय किया कि योग और आयुर्वेद की आलोचना के लिए पहले उनके बारे में जाने और प्रयोग करें। अतः एक रोज वें बाबा के योग शिविर में जा पहुँचे। योग सीखा और अपनी प्रैक्टिस में आने वाले मरीजों को भी कुछ आसान के लिए प्रेरित करने लगे। योग के सकारात्मक परिणाम ने उनकी मनोदशा को भी बदलकर रख दिया और अब वें योगशिक्षक के रूप में निशुल्क सेवा कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही होता है उन लोगों के साथ भी; जो हिन्दू धर्म की आलोचना करने के लिए वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगते है और सत्मार्ग को पहचान कर उस पर चलकर अपना उद्धार कर लेते हैं। कुछ लोग भोग के वश में होकर भोग सामग्रियों के लिए ही शास्त्र के अभ्यास में लग जाते है और परम् पद प्राप्त कर लेते हैं।शास्त्रों में निपुण योग्य गुरु का निरन्तर श्रवण या शास्त्रों का नियमित अध्ययन मनुष्य को सच में मनुष्य बना देते हैं। इसलिए आजकल के पढ़ेलिखे समाज में मनुष्य को चाहिए कि धूर्त के व्यख्यान सुनने की अपेक्षा स्वयं अपने धर्मग्रन्थों यथा भागवत गीता, रामायण, ...

नदी में फेन नही ,वृद्धावस्था के श्वेतकेश

सुबह सुबह ऋषिकेश की पावन भूमि पर पग धर चुके थे। अब भौंर का मन्द प्रकाश जैसे जैसे लालिमा लेता जा रहा था, हमारे डग गंगा घाट की और अग्रसर थे और निन्दियायी आँखों में गंगा की ताजगी के दर्शन की अभिलाषा आँखों को फाड़े डाल रही थी। कुछ ही पलों के उपरान्त हम गंगा में डुबकी लगा रहे थे। गंगा का वेग गंगा की महानता के गीत सुनाता हुआ नृत्य कर रहा था और हम उन सुरों को अपने आक्षेप से बेसुरा कर रहे थे। गंगा माँ से यह सहन न हुआ तो अपनी शीतलता हम पर उड़ेल दी और हम काँपते हुए किनारे पर आ बैठे।गंगा की महानता को निहारते हुए विचारों की नदी उफान मारने लगी। यदि देखा जाये तो यह जीवन भी एक नदी ही है। इसमें नाना प्रकार के विक्षेप बड़ी बड़ी लहरों के समान है। कालचक्र ही इनमें भँवरें बनकर उठता है। जन्म और मृत्यु ही इसके दो तट हैं तथा इसमें सुख-दुःख की छोटी छोटी तरंगें उठती रहती हैं। यौवन का उल्लास ही इसका कीचड़ है।वृद्धावस्था के श्वेत केश ही इसके धवल फेन हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाह की रेखा है।इसमें नाना प्रकार के जड़रव(मूर्खों का कोलाहल)और जलरव( जल की ध्वनि ) हैं। राग-द्वेष रुपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतल पर इस...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...