किसी भी देश के उत्थान में वहाँ की शिक्षा का अमूल्य योगदान होता है।भारत जैसा देश अपनी महान शैक्षिक परम्परा पर गर्व कर सकता है, किन्तु भारत में अपनी शिक्षा की उपेक्षा करके पाश्चात्य शिक्षा की नींव पर उत्थान के सपने देखना बड़ा हास्यस्पद है। नवीन खोजों के लिए हम प्रायः पाश्चात्य विद्वानों का अनुसरण करके ही आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अपने विद्वानों पर से तो जैसे विश्वास ही उठ गया है।यही प्रेरणा हम अगली पीढ़ी को दे रहें हैं। किसी विषय के मूल को पढ़ाते हुए भी हम अपने विद्यार्थियों को अपने विद्वानों और उनके अनुसन्धान के विषय में बताना पसन्द नही करते।क्या अपनों का अनादर करके विकसित होने पर हम सन्तुष्टि का अनुभव कर सकते है? जीवविज्ञान में बचपन से हम जीवों के वर्गीकरण के विषय में पढ़ते थे। हमें कभी पता नही चला कि इस विषय में भारतीय मनीषियों का भी कोई योगदान है।आज भी आप विकिपीडिया उठाकर देख लीजिए किसी भारतीय का नाम उसमे नही मिलेगा । एक उदाहरण विकिपीडिया से नकल करके दे रहा हूँ-- ग्रीस के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपॉक्रेटीज (Hippocrates, 46-377 ई. पू.) ने और डिमॉक्रिटस (Democritus, 465-370 ई...