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सुख का स्थान


जब इस सृष्टि की रचना हुई तब हमारी यह पृथ्वी भी सूर्य की ही भांति अग्नि का एक तपता हुआ गोला थी। इस तथ्य पर विज्ञान की सम्मति है। जिस बात को विज्ञान प्रमाणित कर देता है उस बात को तब तक नकार पाना असंभव है जब तक कि विज्ञान ही उसे अप्रमाणित ना कर दे। इस बात पर भी प्राय सर्व सहमति है कि विज्ञान इस विश्व को पश्चिम की देन है। विज्ञान हमारी प्रकृति के भौतिक पक्ष का संश्लेषण और विश्लेषण करके प्राप्त हुए ज्ञान को हमारे समक्ष रखता है।
हमारी ज्ञान परंपरा तो आधुनिक विज्ञान से अत्यधिक प्राचीन है। यद्यपि पंडित जवाहरलाल नेहरु भी डिस्कवरी ऑफ इंडिया लिखते हुए मैक्स मूलर आदि पश्चिमी विचारको के तर्कों के सामने धोखा खा गए। वह भी हमारी ज्ञान परंपरा की प्राचीनता को नहीं जान सके। वें आर्यों का आगमन पश्चिमी दिशा से मानते हैं और वह भी ईसा से लगभग 1000 वर्ष पूर्व। किंतु हमारी वैदिक रचनाएं इस कालक्रम से अत्यंत प्राचीन है तथा उस पर कोई भी यूरोपियन छाप नहीं है। इसलिए यह कहना सर्वथा गलत है कि आर्य भारत के मूल निवासी नहीं है अपितु बाहर से आए हैं। आर्य सभ्यता का विकास पूरी तरह से भारत में ही हुआ। यदि पंडित नेहरू मैक्स मूलर के इतिहास के साथ साथ उपनिषदों के शंकर भाषा भी पढ़ लेते तो शायद आर्य सभ्यता के कालखंड को वह ठीक से जान पाते ।
हमारे ऋषियों और मनीषियों के शोध आज के विज्ञान से भी आगे के जान पड़ते हैं। अथर्ववेदीय शाखा का मुंडक उपनिषद् प्रकृति की उत्पत्ति के विषय में उद्घोष करता है कि-
तस्मादग्नि: समिधो यस्य सूर्य: सोमातपरजन्य ओषधय: पृथिव्याम।

अर्थात ईश्वर से अग्नि देव प्रकट हुए जिसकी समिधा सूर्य है। उस अग्नि से सोम उत्पन्न हुआ । सोम से मेघ उत्पन्न हुए और मेघ से वर्षा द्वारा पृथ्वी में नाना प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुई।
आइये इस पंक्ति को समझने का प्रयास करें। लेखन सामग्री के अभाव में ज्ञान के संक्षिप्तीकरण में हमारे मनीषी थोड़े शब्दों में विचारों के सागर भर गए हैं। गुरु शिष्य परंपरा में ज्ञान का प्रसार करते हुए गुरु द्वारा व्याख्या पर बल देने की शिक्षा पद्धति विकसित की गई। और योग्य गुरु उपरोक्त सूक्ति की व्याख्या करते हुए स्पष्ट करते हैं कि सूर्य समिधा है इसका अर्थ यह है कि सूर्य अग्नि का अधिष्ठान है। सूर्य से हम अग्नि को समझ सकते हैं क्योंकि सूर्य अग्नि के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है। यही अग्नि विश्व भर में व्याप्त है किंतु अग्नि के अनुभव के लिए प्रतिअग्नि का होना आवश्यक है जो इसी अग्नि से उत्पन्न होती है और सोम कहलाती है। सोम अग्नि का अत्यंत विरोधी है। अग्नि में तप्त गुण है, अग्नि में उष्ण गुण हैं; तो सोम में ठंडक है, शीतलता है; और यही शीतलता मेघों को जन्म देती है तथा मेघ जल वर्षा करके तपती हुई पृथ्वी को शीतलता देते हैं और पृथ्वी में यही शीतलता औषधियों के लिए अनुकूल वातावरण है। यहाँ औषधि का मतलब वनस्पतियों से है। और इस प्रकार सृष्टि क्रम आगे बढ़ता है।
क्या आधुनिक विज्ञान इस सिद्धांत से कुछ अलग कह रहा है? यदि आपको लगता है कि विज्ञान कुछ अलग कह रहा है तो कृपया मुझे बताएं और यदि आप मेरी बात से सहमत हैं तो मैं आपको एक बात डंके की चोट पर बताता हूं-- सनातन धर्म में जो ज्ञान है, सनातन धर्म का जो दर्शन है, सनातन धर्म का जो नीतिशास्त्र है; वह विश्व में उच्चतम कोटि का है। और यदि आप सनातन धर्म में विश्वास रखते हैं तो अपने धर्म को थोड़ा समय दीजिए। सप्ताह के 6 दिन आप कुछ भी कर्म कीजिए किंतु एक दिन रविवार का अपने धर्म को दीजिए। उस दिन श्रद्धा पूर्वक अपने प्राचीन धर्म की पुस्तकों जैसे ब्रह्म सूत्र योग-वशिष्ठ, उपनिषद, दर्शन, रामायण, गीता,
आदि का अध्ययन कीजिए । फिर देखिए आपको विश्व के सब सुख वहां प्राप्त होंगे। दुख का अत्यंत निवारण हो जाएगा। क्या विश्व में ऐसा कोई व्यक्ति है जो दुखों के साथ जीना चाहता है?
तो सुख का एकमात्र संधान सनातन धर्म में है। इसलिए इसके अध्ययन को समय अवश्य दीजिए।

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