शब्द, अर्थ और परमतत्व मानव बुद्धि के अलग अलग सोपानों पर निर्भर है। शब्द मुख्यतः कानों का विषय है। कानों के ईयरड्रम पर जो ध्वनि तरंगे टंकार करती है वे ही शब्दों के रूप में ग्रहण किये जाते हैं। जब यें शब्द सनसेरी नर्व्स द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचाए जाते हैं तो मस्तिष्क उनका तुरन्त विश्लेषण करता है और उनके अर्थों को ग्रहण करके रिस्पॉन्स देता है। इसी प्रकार अर्थों को जिह्वा द्वारा शब्दों के रूप में बाहर करने का काम भी मस्तिष्क करता है मोटर नर्व्स के माध्यम से जो मस्तिष्क से आदेश लेकर इंद्रियों को सक्रिय करती हैं। इसीलिए तो महापुरुष कहते हैं कि आपने जो कहा वह आप पर निर्भर है और सुनने वाले ने जो सुना वह उस पर निर्भर है। वास्तव में आप अपने अर्थ को शब्दों में ढालकर सम्प्रेषित करते है और अन्य व्यक्ति उन शब्दों को अपने ही अर्थ में ग्रहण करता है। विभिन्न परिस्थितियों में समान शब्दों के विभिन्न अर्थ बन जाते हैं, क्योंकि सभी परिस्थितियां मनुष्य के मन में एक पूर्वाग्रह का अर्द्ध पारदर्शी आवरण बना देती हैं। इनमें से छनकर जब शब्द मन मे अर्थ के रूप में निरूपित होते हैं तो उसी परिस्थिति में रहने वालों क...