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शब्द, अर्थ और पूर्वाग्रह


शब्द, अर्थ और परमतत्व मानव बुद्धि के अलग अलग सोपानों पर निर्भर है। शब्द मुख्यतः कानों का विषय है। कानों के ईयरड्रम पर जो ध्वनि तरंगे टंकार करती है वे ही शब्दों के रूप में ग्रहण किये जाते हैं। जब यें शब्द सनसेरी नर्व्स द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचाए जाते हैं तो मस्तिष्क उनका तुरन्त विश्लेषण करता है और उनके अर्थों को ग्रहण करके रिस्पॉन्स देता है। इसी प्रकार अर्थों को जिह्वा द्वारा शब्दों के रूप में बाहर करने का काम भी मस्तिष्क करता है मोटर नर्व्स के माध्यम से जो मस्तिष्क से आदेश लेकर इंद्रियों को सक्रिय करती हैं।
इसीलिए तो महापुरुष कहते हैं कि आपने जो कहा वह आप पर निर्भर है और सुनने वाले ने जो सुना वह उस पर निर्भर है। वास्तव में आप अपने अर्थ को शब्दों में ढालकर सम्प्रेषित करते है और अन्य व्यक्ति उन शब्दों को अपने ही अर्थ में ग्रहण करता है। विभिन्न परिस्थितियों में समान शब्दों के विभिन्न अर्थ बन जाते हैं, क्योंकि सभी परिस्थितियां मनुष्य के मन में एक पूर्वाग्रह का अर्द्ध पारदर्शी आवरण बना देती हैं। इनमें से छनकर जब शब्द मन मे अर्थ के रूप में निरूपित होते हैं तो उसी परिस्थिति में रहने वालों के शब्दों के तो अनुकूल ही निरूपित होते हैं किन्तु अन्य परिस्थिति में रहने वाले मनुष्यों के मन के अर्थ से विक्षिप्त हो जाते हैं।मानवमात्र के मन को सही समझने के लिए इस पूर्वाग्रहों के आवरण को समाप्त करना अति आवश्यक होता है। एक मानव जाति में जितने भी मतभेद हैं सब इसी आवरण के कारण है। विश्व मे जितनी भी विचारधाराएं हैं, इसी आवरण के कारण हैं। जब हमें इस बात पर सहमत होना पड़ता है कि हम आपस में कभी सहमत नही हो सकते तो यह हमारी उस विवशता को दर्शाता है कि हम उस आवरण को दूर करने का प्रयास नहीं कर सकते।
ऐसा नहीं है कि वह समाप्त नहीं हो सकता किन्तु मनुष्यों के पास न तो इसके लिए समय है, न इच्छाशक्ति है और न प्रयास ही है। यद्यपि यही आवरण विश्व के सभी विवादों की जड़ है किन्तु हम विवादों के समाधान भी इसी आवरण के प्रभाव में ढूंढने के प्रयास करते हैं। सदियों से सभ्य मानव इतिहास को लिपिबद्ध किया जा रहा है। किन्तु हम इस इतिहास से कुछ भी नही सीख पा रहे हैं तो इसका कारण यही है कि हम आज भी इस मानवमात्र के लिए अनावश्यक पूर्वाग्रह के इस अर्द्धपारदर्शी आवरण को अपने मन में सजाए बैठे हैं।
पूर्व में कितने ही ऐसे महान व्यक्ति हुए हैं जो सब जीवों में एक ही आत्मतत्व का वास देखते हुए समदर्शी हो जाते थे। वे वही व्यक्ति थे जिन्होंने उस आवरण को तप और विद्या की अग्नि में जलाकर नष्ट कर दिया था और विश्व को एक नई रोशनी दिखाई थी। दुःख का विषय है कि वह दिव्य रोशनी हमारी आँखों के लिए रचोन्दा बन गयी जिससे हम सत्य से दूर होते चले गए।
ऐसा नही है कि हम पुनः उस रोशनी से अपने और मानव मात्र के जीवन के पथ में उजाला नही कर सकते। थोड़ी सी अपने दिशा बदलो,वही रोशनी आपको मार्ग दिखाएगी। दिशा बदलने के लिए हमें समय की आवश्यकता है। अतः प्रकृति के साथ मिलकर योग द्वारा अपना जीवनकाल बढाइये। नियम का पालन करके अपनी इच्छाशक्ति को बढाइये। और इनके लिए आपका प्रयास आवश्यक है। इस भौतिक विश्व से ऊपर उठकर मानसिक विश्व में भी विचरण कीजिये। यदि मानसिक विश्व में विचरण का सही मार्ग आपने पकड़ लिया तो आप आध्यात्मिक विश्व में भी अपना मार्ग ढूंढ लेंगे और फिर पूर्वाग्रहों का वह अर्द्ध पारदर्शी आवरण स्वयं क्षीण होता चला जायेगा।
विक्रमचार्य जी (विक्रम सिंह)

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