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जनवरी, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सुभाष जयंती--राष्ट्रीय पर्व

गुलामी सभ्य समाज की सबसे बड़ी दुर्बलता है । भारत देश अपने इस दुर्भाग्य को सदियों तक झेलता आया है। सबसे पहले संभवत पांडव ऐसे लोग थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाई थी किन्तु वह आवाज नारी सम्मान के रूप में अधिक प्रखर थी। स्वतंत्रता के लिए उठने वाली अंतिम आवाज दो महान वीर भारतीयों की थी, जिनमें से एक थे मोहनदास करमचंद गांधी; और दूसरे थे सुभाष चंद्र बोस। दोनों की आजादी प्राप्त करने के मायने तो एक थे किंतु तरीकों की दिशाएं सर्वथा जुदा थी। सुभाष चंद्र बोस जो चाहते थे की पांडवों की भाँति युद्ध करके आजादी प्राप्त की जाए किन्तु गीता में से भी अहिंसा को खोज लेने वाले गाँधी जी का मानना था कि युद्ध की अपेक्षा प्रेम, शान्ति, और अहिंसा से आजादी प्राप्त की जाए। आज की परिस्थितियों में हमें सुभाष ज्यादा सही लगते हैं किन्तु इन दोनों महापुरुषों की जीवनी पर गहराई से नजर डालें तो तत्कालीन परिस्थितियों में गाँधी अधिक सटीक लगते हैं। एक कहानी है कि एक विधवा औरत भेड़ चराकर किसी तरह अपना गुजर बसर करती थी। एक दिन एक जमीदार जो बहुत रसूखदार था तथा आसपास के सैंकड़ो गाँवों पर उसकी ज़मीदारी थी,के नौकरों ने उस व...

विवेकानन्द का महत्व दयानन्द से अधिक क्यों?

ऐसा क्यों है कि स्वामी दयानंद की अपेक्षा हम स्वामी विवेकानन्द को अधिक महत्व देते है? दोनों ऋषियों ने हिन्दू धर्म के लुप्तप्राय ज्ञान को पुनर्प्रतिष्ठा प्रदान की। दोनों ने पाखण्ड का खुलकर विरोध किया। दोनों ने हिन्दू धर्म में पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त किया। दोनों ने वेद के महत्व को समझा और वेदार्थ को जगतपटल पर रखा। दोनों ने हिन्दू धर्म के सनातन सत्यज्ञान का अन्वेषण किया और अपने चरित्र से हिंदुत्व के चरित्र को दुनिया के सामने रखा। दोनों ने सनातनी मूल्यों को आत्मसात करते हुए समाज सेवा करते हुए अपने जीवन बलिदान किये। फिर ऐसा क्यों है कि स्वामी दयानंद चन्द हिन्दुओं(आर्य समाजियों) के ही प्रेरणास्रोत रह गए और स्वामी विवेकानन्द राष्ट्र के युवाओं के प्रेरणास्रोत ??? कृपया सभी प्रबुद्ध लोग इस बहस का भाग बनें।।

भीष्म के कर्मफल

अर्जुन का रोना थमने का नाम नही ले रहा था। दुर्योधन इस रोने को मगरमच्छ के आँसू सिद्ध करने में लगा था और लगातार उसे अपशब्द बोल रहा था। श्रीकृष्ण खड़े मुस्कुरा रहे थे। अन्य सभी कौरव-पाण्डव अपने अपने भाव लिए पितामह को घेरे खड़े थे। और पितामह अर्जुन द्वारा दी गयी शरशय्या पर शान्त पड़े थे। तभी पितामह भीष्म ने लम्बी सांस ली और बोले," पुत्र दुर्योधन! अपशब्दों से अपनी जिह्वा को गंदा न करो। अर्जुन! तुम भी विषाद न करो। तुम दोनों वीर योद्धा हो। तुम्हे तुम्हारा यह व्यवहार शोभा नही देता। जो कुछ भी हुआ है इसमें सब कुछ मेरे ही कर्मों का फल है। "पूरा वातावरण शान्तिमय हो गया।सब पितामह भीष्म की ओर देख रहे थे। भीष्म मुस्कुराये और बोले," केशव के मुखमण्डल पर फैली मोहक मुस्कान स्पष्ट कह रही है कि वें सब जानते हैं। तुम सब में केवल वे ही हैं जो दुखी नही हैं। इसीलिए उनके दर्शन मुझे सुकून पहुँचा रहे है। चूंकि मैंने जीवनभर ब्रह्मचर्य का पूरे मनोयोग से पालन किया है इसलिए मैं भी जानता हूँ कि यह सब कर्मफल के अतिरिक्त कुछ नही है।" युधिष्ठिर आगे बढ़े और हाथ जोड़कर बोले,"हे पितामह! हम इस पाप के ब...