गुलामी सभ्य समाज की सबसे बड़ी दुर्बलता है । भारत देश अपने इस दुर्भाग्य को सदियों तक झेलता आया है। सबसे पहले संभवत पांडव ऐसे लोग थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाई थी किन्तु वह आवाज नारी सम्मान के रूप में अधिक प्रखर थी। स्वतंत्रता के लिए उठने वाली अंतिम आवाज दो महान वीर भारतीयों की थी, जिनमें से एक थे मोहनदास करमचंद गांधी; और दूसरे थे सुभाष चंद्र बोस। दोनों की आजादी प्राप्त करने के मायने तो एक थे किंतु तरीकों की दिशाएं सर्वथा जुदा थी। सुभाष चंद्र बोस जो चाहते थे की पांडवों की भाँति युद्ध करके आजादी प्राप्त की जाए किन्तु गीता में से भी अहिंसा को खोज लेने वाले गाँधी जी का मानना था कि युद्ध की अपेक्षा प्रेम, शान्ति, और अहिंसा से आजादी प्राप्त की जाए। आज की परिस्थितियों में हमें सुभाष ज्यादा सही लगते हैं किन्तु इन दोनों महापुरुषों की जीवनी पर गहराई से नजर डालें तो तत्कालीन परिस्थितियों में गाँधी अधिक सटीक लगते हैं। एक कहानी है कि एक विधवा औरत भेड़ चराकर किसी तरह अपना गुजर बसर करती थी। एक दिन एक जमीदार जो बहुत रसूखदार था तथा आसपास के सैंकड़ो गाँवों पर उसकी ज़मीदारी थी,के नौकरों ने उस व...