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सुभाष जयंती--राष्ट्रीय पर्व


गुलामी सभ्य समाज की सबसे बड़ी दुर्बलता है । भारत देश अपने इस दुर्भाग्य को सदियों तक झेलता आया है। सबसे पहले संभवत पांडव ऐसे लोग थे जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए आवाज उठाई थी किन्तु वह आवाज नारी सम्मान के रूप में अधिक प्रखर थी। स्वतंत्रता के लिए उठने वाली अंतिम आवाज दो महान वीर भारतीयों की थी, जिनमें से एक थे मोहनदास करमचंद गांधी; और दूसरे थे सुभाष चंद्र बोस। दोनों की आजादी प्राप्त करने के मायने तो एक थे किंतु तरीकों की दिशाएं सर्वथा जुदा थी। सुभाष चंद्र बोस जो चाहते थे की पांडवों की भाँति युद्ध करके आजादी प्राप्त की जाए किन्तु गीता में से भी अहिंसा को खोज लेने वाले गाँधी जी का मानना था कि युद्ध की अपेक्षा प्रेम, शान्ति, और अहिंसा से आजादी प्राप्त की जाए।
आज की परिस्थितियों में हमें सुभाष ज्यादा सही लगते हैं किन्तु इन दोनों महापुरुषों की जीवनी पर गहराई से नजर डालें तो तत्कालीन परिस्थितियों में गाँधी अधिक सटीक लगते हैं।
एक कहानी है कि एक विधवा औरत भेड़ चराकर किसी तरह अपना गुजर बसर करती थी। एक दिन एक जमीदार जो बहुत रसूखदार था तथा आसपास के सैंकड़ो गाँवों पर उसकी ज़मीदारी थी,के नौकरों ने उस विधवा की भेड़ों पर कब्जा करके अपनी भेड़ों में मिला ली। विधवा बहुत दुखी हुई। वह बेचारी गरीब औरत इतने बड़े जमीदार से तो भिड़ नही सकती थी। बहुत सोच विचार कर वह ज़मीदार के पास गई और उसके नौकरों की शिकायत करते हुए अपनी भेड़ वापसी की मांग की। ज़मीदार जोर से हसाँ ओर बोला कि अब वें भेड़ उसकी हैं और उन्हें कोई नही ले सकता। महिला रोती हुई वापस आ गयी।
अगले दिन वह पुनः ज़मीदार कर पास पहुँची और अपनी भेड़ों की मांग की। ज़मीदार ने उसे फिर धमका दिया।
अगले दिन वह फिर पहुँची और ज़मीदार के अच्छे कामों की खूब तारीफ की। ज़मीदार का चेहरा खिल गया। महिला ने यह देखकर पुनः अपनी भेड़ों की मांग की तो गुस्साए ज़मीदार ने उसे अपने लठैतों से पिटवा कर भगा दिया।
कुछ दिनों में महिला ठीक हो गई और फिर से भेड़ लेने जा पहुँची। ज़मीदार अपने एक मित्र ज़मीदार से बात कर रहा था। महिला ने ज़मीदार की जय बोलते हुए उसकी भेड़ो को लौटाने की प्रार्थना की। ज़मीदार ने पुनः अपने लठैतों को बुला लिया। रोती कराहती महिला फिर लौट गई। धीरे धीरे यह बात आसपास के गाँव मे भी फैल गयी। ग्रामीण महिला के पास पहुँचे और अपने अपने दुखड़े रोये। महिला को सब्र कर लेने की सलाह भी दी। किन्तु महिला की निडरता, जिद और सत्य के लिए हर दुख सहने की क़ाबलियत देखकर संघर्ष में उसके साथ हो गए। ज़मीदार के दोस्त भी उसे समझाने लगे कि क्यों असहाय पर जुल्म करता रहता है। उसकी भेड़ उसे वापस कर और पीछा छुड़ा। ज़मीदार को भी लगा कि अब उसकी किरकिरी हो रही है तो उसने न केवल विधवा की भेड़ लौटा दी बल्कि उसके साथ लगे लोगों को भी यथायोग्य राहत दे दी।
कहानी को पुनः दोहराते है। जब औरत ने अपनी भेड़ो की मांग की तो ज़मीदार ने उसे डरा धमका कर भगा दिया। औरत ने पता लगाया कि आसपास कुछ ऐसे ज़मीदार हैं जो उस ज़मीदार के दुश्मन हैं। महिला उनके पास गई और उनसे लड़ने के लिए सहायता माँगी। दुश्मन ज़मीदार इस बात से खुश हुए कि उसकी प्रजा ने ही उसके ख़िलाफ़ लड़ने का मन बनाया है । उसने पर्याप्त मात्रा में लठ और तलवारे ओर औरत को दी और धन भी दिया। औरत ने अन्य ज़मीदार के पीड़ितों के साथ मिलकर ज़मीदार के घर पर हल्ला बोल दिया। ज़मीदार के लठैतों ने भी अपनी अपनी लाठियों को खूब तेल पिला रखा था। ऊपर से उसके दोस्त जमीदारों ने भी अपने लठैत भेज दिए। युद्ध में एक एक कर लोग खेत होते रहे। उधर उस महिला के हथियार भी छिन गए वह फिर से लाठी मांगने अपने साथी ज़मीदार के पास पहुँची तब तक उसे ज़मीदारी के पद से च्युत किया जा चुका था। निराश महिला वापस लौटी तो उसने देखा कि उसके लगभग सभी साथी हताहत हो चुके हैं। महिला को बड़ा सदमा लगा और उसने अपनी भेड़ वापस न लेकर सन्यास ले लिया। इस प्रकार सब कुछ खोकर अधिकार की उसकी जंग खतम हो गई।
इन दोनों कहानियों में किस महिला को आप वीर मानेंगे?
मेरे विचार से तो दोनों ही वीरांगनायें हैं। क्योंकि दोनों की वीरता में तनिक भी खोट नही है। किन्तु दूसरे की सहायता से अपनी लड़ाई लड़े तो हम उसकी परिस्थिति के अधीन हो जाते है। ऐसा ही हमारे वीर सुभाष के साथ हुआ था। किन्तु गाँधी जी का अस्त्र भी स्वदेशी था और सोच भी प्राकृतिक थी। इसीलिए उनका संघर्ष लम्बा चला। किन्तु अंग्रेजों की कमर तोड़ने में सुभाष का भी बराबर का योगदान था। भले ही उनका युद्ध अंतिम परिणति को न पा सका हो किन्तु अंग्रेजों के पाँव अवश्य उखाड़ दिए थे। किंतु कभी कभी सोचता हूँ कि यदि जापान और जर्मनी की सहायता से सुभाष बाबू अंग्रेजों को परास्त करके भारत को स्वतंत्र करा भी लेते तो क्या भारत उनके हस्तक्षेप से अछूता रह सकता था। बाद कि परिस्थितियों को देखें तो कुवैत अमरीका की सहायता से इराक से तो आजाद हो गया किन्तु अब अमरीका से कैसे आजाद हो। कमोबेश यही स्थिति अफगानिस्तान की भी है। उधर अपने दम पर आजाद हुए देश कजाकिस्तान आदि खूब तरक्की कर रहे है।
अतः भारत को गाँधी के परम आवश्यकता थी। किन्तु गाँधी के समय मे ही भारत शायद आजाद न होता यदि सुभाषचंद्र बोस न हुए होते। इसलिए यदि गाँधी जी का जन्मदिन राष्ट्रीय पर्व है तो सुभाष का जन्मदिन भी राष्ट्रीय पर्व होना चाहिए। आप का क्या कहना है?

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