तभी पितामह भीष्म ने लम्बी सांस ली और बोले," पुत्र दुर्योधन! अपशब्दों से अपनी जिह्वा को गंदा न करो। अर्जुन! तुम भी विषाद न करो। तुम दोनों वीर योद्धा हो। तुम्हे तुम्हारा यह व्यवहार शोभा नही देता। जो कुछ भी हुआ है इसमें सब कुछ मेरे ही कर्मों का फल है। "पूरा वातावरण शान्तिमय हो गया।सब पितामह भीष्म की ओर देख रहे थे। भीष्म मुस्कुराये और बोले," केशव के मुखमण्डल पर फैली मोहक मुस्कान स्पष्ट कह रही है कि वें सब जानते हैं। तुम सब में केवल वे ही हैं जो दुखी नही हैं। इसीलिए उनके दर्शन मुझे सुकून पहुँचा रहे है। चूंकि मैंने जीवनभर ब्रह्मचर्य का पूरे मनोयोग से पालन किया है इसलिए मैं भी जानता हूँ कि यह सब कर्मफल के अतिरिक्त कुछ नही है।"
युधिष्ठिर आगे बढ़े और हाथ जोड़कर बोले,"हे पितामह! हम इस पाप के बोझ तले दबे जा रहे हैं। किन्तु आपकी वाणी हमें हल्का होने को विवश कर रही है। कृपया आप जो जानते है वह खुलकर बताये ताकि आपके ज्ञान से हम सब भी तृप्त होकर इस भार से पूर्णतः मुक्त हो सकें।"
भीष्म बोले," अब से सात जन्म पहले मैं एक चरवाहा था। प्रायः पशु चराने के लिए बबूल के वनों में भी चला जाता था। एक बार जब मै पशु चरा रहा था तो समय बिताने के लिए कोई काम ढूंढ रहा था। तभी मेरी दृष्टि एक टिड्डे पर पड़ी। मैंने सावधानी से उसे उठाया और एक बबूल का काँटा लेकर उस टिड्डे के आर-पार कर दिया। इस खेल में मुझे आनन्द का अनुभव हुआ। मैंने वह क्रिया बार बार दोहराई और उस टिड्डे को हजारों जगह दे बींध दिया। टिड्डे ने तड़प तड़प कर दम तोड़ दिया। वह टिड्डा ही इस जन्म में अर्जुन है। यद्यपि मैंने अनजाने में ऐसा किया था, किन्तु उस कर्म का फल तो मुझे भोगना ही था। उस टिड्डे द्वारा अर्जुन के रूप में आकर,मेरे कर्मों का प्रतिफल देने के लिए,मुझे सात जन्मों तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। अब जाकर मेरे कर्मफल पूर्णता को प्राप्त हुए हैं। बस टिड्डे की भाँति थोड़ा और तड़पना बाकी है उसके बाद मेरा मोक्ष निश्चित है। उसके लिए मैं अभी प्राणत्याग नही करूँगा। मैं सूर्य के उत्तरायण होने के बाद ही देहत्याग करूँगा।" यह कहकर भीष्म पितामह मौन हो गए और आंखे बन्द कर ली।
महाभारत ग्रन्थ का यह छोटा सा दृष्टान्त जीवन के मूल्यों का कितना बड़ा खजाना खोलकर हमारे समक्ष रख देता है।इसमें ब्रह्मचर्य की महत्ता को सुंदर ढंग से समझाया गया है। आत्मनियंत्रण से मनुष्य बड़ी से बड़ी सिद्धि प्राप्त कर लेता है, जैसे भीष्म त्रिकालदर्शी हो गए थे। अतः अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित करने का अभ्यास हमें करते रहना चाहिए।
वीरों को न तो विषाद करना चाहिए और न अपशब्दों का प्रयोग करना चाहिए । सीमा पर हमारे जवान आज भी इसी आदर्श को मानकर लगातार हमारी रक्षा करते है।
ज्ञानीजन कभी धैर्य से दूर नही होता। वह प्रत्येक सांसारिक दुःख का सामना मुस्कुराते हुए करते हैं। श्री कृष्ण इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
सबसे बड़ी बात जो इस दृष्टान्त से निकलकर आयी है वह है 'कर्मफल'। आपसे बुरा कर्म चाहे जानबूझकर हो या अनजाने में, उसका यथायोग्य फल मिलना तो तय है। अतः माता-पिता व गुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को बचपन से सजग रखें। बचपन की उनकी सजगता ही युवा अवस्था में उनका विवेक निर्धारित करती है। वही विवेक उनके जीवन को दिशा देता है।
यदि माता-पिता व गुरु स्वयं को इन कार्यों के लिए अक्षम पाते हैं तो उनको चाहिए कि घर में रामायण, महाभारत, गीता आदि के प्रबोधन उत्सव मनाकर बालकों तक पहुंचाने का कार्य करें। महान पुरुषों के जन्मदिन को पूरे उल्लास से मनाएं। अपने देश व धर्म मे महान पुरुषों की कोई कमी नही है। हमारी ऋषि परम्परा बहुत समृद्ध है। भीष्म भी उन्ही ऋषियों में से एक है।

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