कुछ लोग सोमरस को शराब के रूप में प्रचारित करने के दुष्चक्र चला रहे हैं। उनके लिए मैं कहना चाहता हूं कि सोम का अर्थ है शीतलता। सोमरस भारतीय इतिहास में पिया जाने वाला पेय पदार्थ था जो मन को शीतलता प्रदान करता था, तनाव से मुक्ति दिलाता था, मनुष्य को पापमुक्त रहने की प्रेरणापथ पर चलाता था । यज्ञ में इसका सेवन किया जाता था। निश्चित रूप से सोमरस आजकल के चरणामृत की भांति का पेय था जो मानव में पवित्रता के संकल्प के लिंगरूप में प्रयुक्त होता था।
सिखों की परंपरा में अमृत चखने से मनुष्य संकल्प से सिख बन जाता है। सनातन परम्परा में सोमरस का जगह जगह पर वर्णन मिलता है। प्रत्येक वर्णन में शुद्धता का भाव है। यह भी इसी अमृत की भाँति शुभ संकल्प के संस्कारों पर पिया जाने वाला पेय था किन्तु दुर्भाग्य से इस पेय को बनाने की विधि कालान्तर में इसी प्रकार विलुप्त हो गयी जैसे कठ उपनिषद में वर्णित अग्निविद्या।
इसी बात का फायदा उठाते हुए भारतीय संस्कृति को अपमानित करने के लिए धूर्त लोगो ने इसे नशीला पेय के रूप में प्रचारित किया।
दर्शन पढ़ कर देखो। भारतीय दर्शनों में निकृष्टम माने जाने वाले चार्वाक दर्शन में भी नशे को प्रोत्साहित नही किया गया। चार्वाक उद्घोष " यावत जीवेत सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतं पीबेत " में भी उधार मांगकर घी पीने की बात की जाती है किंतु मौज-मस्ती के लिए किसी नशीले पदार्थ को नही सुझाया जाता।
अतः भारतीय सनातन परंपरा को बदनाम करने के लिए भारतीय संस्कृति को विकृत करने का षड्यंत्र सतत जारी है और कुछ मूर्ख भारतीय इसी में आस्था का प्रतिबिंब देखने की भूल कर बैठते है और दूसरों को खुद पर हँसने का अवसर दे देते है। मित्रो! अपने को, अपनी संस्कृति को, अपनी समृद्ध परम्पराओं को समझना है तो वेद के जानकार योग्य गुरु का श्रवण करो। यदि आप पढ़ना जानते है तो शास्त्रों( वेद, ब्रह्मसूत्र और उपनिषद,आदि ग्रन्थों)के अध्ययन की आदत डालो। इन कालजयी रचनाओं को अच्छी प्रकार समझो और फिर अपनी अंतर्दृष्टि को विकसित करके सत्य तक पहुँचों।यदि पढ़ने के लिए समय नही निकाल पा रहे हैं तो यू ट्यूब पर विक्रमाचार्यजी का चैनल सब्सक्राइब करके पूजा के समय 10 मिनट ध्यान से उनको सुनो। पैसे कमाने के लिए पुराणों को तोड़मरोड़कर मनोरंजन करने वाले TV धारावाहिकों से दूर रहे और अपने विवेक को अपने से दूर होने न दो। विक्रम सिंह
सिखों की परंपरा में अमृत चखने से मनुष्य संकल्प से सिख बन जाता है। सनातन परम्परा में सोमरस का जगह जगह पर वर्णन मिलता है। प्रत्येक वर्णन में शुद्धता का भाव है। यह भी इसी अमृत की भाँति शुभ संकल्प के संस्कारों पर पिया जाने वाला पेय था किन्तु दुर्भाग्य से इस पेय को बनाने की विधि कालान्तर में इसी प्रकार विलुप्त हो गयी जैसे कठ उपनिषद में वर्णित अग्निविद्या।
इसी बात का फायदा उठाते हुए भारतीय संस्कृति को अपमानित करने के लिए धूर्त लोगो ने इसे नशीला पेय के रूप में प्रचारित किया।
दर्शन पढ़ कर देखो। भारतीय दर्शनों में निकृष्टम माने जाने वाले चार्वाक दर्शन में भी नशे को प्रोत्साहित नही किया गया। चार्वाक उद्घोष " यावत जीवेत सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतं पीबेत " में भी उधार मांगकर घी पीने की बात की जाती है किंतु मौज-मस्ती के लिए किसी नशीले पदार्थ को नही सुझाया जाता।
अतः भारतीय सनातन परंपरा को बदनाम करने के लिए भारतीय संस्कृति को विकृत करने का षड्यंत्र सतत जारी है और कुछ मूर्ख भारतीय इसी में आस्था का प्रतिबिंब देखने की भूल कर बैठते है और दूसरों को खुद पर हँसने का अवसर दे देते है। मित्रो! अपने को, अपनी संस्कृति को, अपनी समृद्ध परम्पराओं को समझना है तो वेद के जानकार योग्य गुरु का श्रवण करो। यदि आप पढ़ना जानते है तो शास्त्रों( वेद, ब्रह्मसूत्र और उपनिषद,आदि ग्रन्थों)के अध्ययन की आदत डालो। इन कालजयी रचनाओं को अच्छी प्रकार समझो और फिर अपनी अंतर्दृष्टि को विकसित करके सत्य तक पहुँचों।यदि पढ़ने के लिए समय नही निकाल पा रहे हैं तो यू ट्यूब पर विक्रमाचार्यजी का चैनल सब्सक्राइब करके पूजा के समय 10 मिनट ध्यान से उनको सुनो। पैसे कमाने के लिए पुराणों को तोड़मरोड़कर मनोरंजन करने वाले TV धारावाहिकों से दूर रहे और अपने विवेक को अपने से दूर होने न दो। विक्रम सिंह

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