सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान,
महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम
तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । ।
अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है।
यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है।
आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अतिरिक्त सब जड़ है मात्र क्रियाशीलता से आप जड़ को चेतन नहीं कह सकते और जड़ में क्रियाशीलता आती चेतन के पुरषार्थ से ही है किन्तु जड़ चेतन नहीं हो सकता और चेतन जड़ नहीं हो सकता।
आचार्य शंकर ने एक भी वाक्य वैदिक साहित्य के बारे में बुरा नहीं बोला हाँ वो बात जरूर है उन्होंने पुरुष को ही जगत का मूल कारण बताया है और प्रकृति का निषेध किया है जोकि वैदिक साहित्य के अनुरूप नहीं है। कपिल मुनि कई हो सकते हैं संभव है किन्तु सांख्य के प्रवक्ता आदि विद्वान् कपिल हैं जिनका समय काल निश्चित नहीं है। सांख्य के विद्वान् कपिल ही हैं ये सभी आर्ष ग्रंथो ने माना है। सांख्य कोई नया दर्शन नहीं है ये वेदों से ही निकला ज्ञान है तो उपनिषदों में उसका वर्णन क्यों नहीं मिलेगा। वेद, उपनिषद, सांख्य, योग, न्याय , वैशेषिक, वेदांत , मीमांसा आदि सभी आर्ष ग्रन्थ विरोधी नहीं हैं और इन सबके ज्ञान का आधार वेद हैं। शंकराचार्य ने सांख्य को अवैदिक घोषित नहीं किया वरन बोद्ध विद्वानों ने नास्तिकता के उद्देश्य से इस तरह की भ्रांतियां फैलाई।
साभार
महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम
तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । ।
अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है।
यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है।
आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अतिरिक्त सब जड़ है मात्र क्रियाशीलता से आप जड़ को चेतन नहीं कह सकते और जड़ में क्रियाशीलता आती चेतन के पुरषार्थ से ही है किन्तु जड़ चेतन नहीं हो सकता और चेतन जड़ नहीं हो सकता।
आचार्य शंकर ने एक भी वाक्य वैदिक साहित्य के बारे में बुरा नहीं बोला हाँ वो बात जरूर है उन्होंने पुरुष को ही जगत का मूल कारण बताया है और प्रकृति का निषेध किया है जोकि वैदिक साहित्य के अनुरूप नहीं है। कपिल मुनि कई हो सकते हैं संभव है किन्तु सांख्य के प्रवक्ता आदि विद्वान् कपिल हैं जिनका समय काल निश्चित नहीं है। सांख्य के विद्वान् कपिल ही हैं ये सभी आर्ष ग्रंथो ने माना है। सांख्य कोई नया दर्शन नहीं है ये वेदों से ही निकला ज्ञान है तो उपनिषदों में उसका वर्णन क्यों नहीं मिलेगा। वेद, उपनिषद, सांख्य, योग, न्याय , वैशेषिक, वेदांत , मीमांसा आदि सभी आर्ष ग्रन्थ विरोधी नहीं हैं और इन सबके ज्ञान का आधार वेद हैं। शंकराचार्य ने सांख्य को अवैदिक घोषित नहीं किया वरन बोद्ध विद्वानों ने नास्तिकता के उद्देश्य से इस तरह की भ्रांतियां फैलाई।
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