यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नहीं पाती। जो नराधम अपनी अभीष्ट वस्तु के लिए अभ्यास अर्थात बार-बार प्रयत्न नहीं करता, वह अनिष्ट वस्तु में ही रत रहता है; इसलिए वह अनिष्ट को ही प्राप्त होता है और एक नरक से दूसरे नरक में गिरता रहता है। जिससे संसार असार बन जाता है, ऐसे विवेक का सेवन करने वाले जो श्रेष्ठ पुरुष आत्मविचार नामक अभ्यास को नहीं छोड़ते, वें निश्चय ही इस बड़ी-चढ़ी विस्तृत माया नदी को पार कर जाते हैं। ईष्ट वस्तु के लिए किया गया चिरकालिक अभ्यास रूपी सूर्य प्रजाजनों के समक्ष ऐसा प्रकाश फैलाता है, जिससे वें देह रूपी भूतल पर रहकर जन्म-मरण आदि सहस्रों अनर्थों को पैदा करने वाली इंद्रिय रूपिणी रात्रि को नहीं देखते।
" बारंबार किए जाने वाले प्रयत्न को अभ्यास कहते हैं, उसी का नाम पुरुषार्थ है।"
उसके बिना यहां कोई गति नहीं है। "अपने विवेक से उत्पन्न हुए दृढ़ अभ्यास नामक अपने कर्म को यत्न कहते हैं।" उसी से यहां सिद्धि प्राप्त होती है और किसी उपाय से नहीं। इंद्रियों पर विजय पाने में समर्थ वीर पुरुष के लिए अभ्यास रूपी सूर्य के तपते रहने पर भूमि में, जल में और आकाश में भी ऐसी कोई अभिलाषित वस्तु नहीं है जो सिद्ध नहीं हो सकती। भूमंडल में तथा पर्वत की समस्त निर्जन गुफाओं में जितने भय के कारण हैं वह सब अभ्यास शाली पुरुष के लिए अभय दायक बन जाते हैं।
अभ्यास के विषय में यह गूढ़ ज्ञान योगवशिष्ठ नामक ग्रंथ के निर्वाण- प्रकरण-उत्तरार्ध के 67वें सर्ग से उद्धृत है। आपकी प्रतिक्रियाओं की अभिलाषा है। धन्यवाद।
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