सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

रूद्र के स्वरूप की पड़ताल


भगवान शिव का रूद्र नामक भयंकर रूप क्यों है? क्यों उनका रँग काला है? उनके पाँच मुख कौन कौन और कैसे है?उनकी दस भुजाओं का रहस्य क्या है? उनके तीन नेत्र कौन कौन से है? और उनके त्रिशूल का क्या अर्थ है?
प्रतीकों में रमण करने वाले हिन्दुओं!क्या कभी इन प्रश्नों पर विचार किया है? तथाकथित पढ़े-लिखे लोग इस मूर्तियों को देखकर हँसते है। उनके हँसने का कारण भगवान शिव का वह स्वरूप ही नही है अपितु हमारे द्वारा उस स्वरूप को भगवान मान लेना है। हम उस प्रतीक में ही खुश है। उस मूर्ति के मुँह में लड्डू ठूँसकर भगवान की पूजा करके सन्तुष्ट हैं। न तो हम भगवान को जानने का प्रयास करते हैं और न हँसने वाले मूर्खों की जिज्ञासा शान्त कर सकते है। यही कारण है कि अपने धर्म से अनभिज्ञ हिन्दू धर्म से ही पलायन कर रहे हैं। दूसरे धर्म में व्याप्त पर्याप्त वासना उन्हें आकर्षित कर रही है।
अतः विद्वपुरुषों ! अपने धर्म के मर्म को समझो और अन्य को भी समझाओ। हमने इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आपसे अनुरोध है कि उसको प्रचारित करें। उपनिषदों के एक एक श्लोक को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम u tube पर भी हैं और इस ब्लॉग पर तो है ही।उपनिषद लिखकर u tube पर खोज करें और हमारा लिंक पाएं। इधर आज हम भगवान रूद्र के विषय में उठने वाले इन प्रश्नों के विषय में चर्चा कर रहें हैं। प्रमाण के लिए योगवशिष्ठ का अवलोकन किया जा सकता है।
जब भगवान शिव अहंकार के अभिमानी रूप से प्रकट होते हैं तो रूद्र कहलाते हैं। यद्यपि भगवान अमूर्त हैं, हम उनको आकाशरूपी भी कह सकते हैं,क्योंकि आकाश भी तो अमूर्त ही है।महाशून्य आकाश मूल रूप से काला है। तारों का अस्तित्व तो मात्र बिंदु समान ही है। उनका अथाह प्रकाश भी आकाश के कालेपन भरी रात्रि को छुपा नही सकता;हाँ , उसमे नीलापन अवश्य ला देता है । इसीलिए रूद्र के साथ साथ हमारे जितने भी ईश्वर के प्रतीक है सब काले या नीले दर्शाये जाते हैं।
चेतनाकाश मात्र ही उनका सारभूत स्वरूप है,इसलिए वे आकाशात्मा कहे गए हैं।सम्पूर्ण भूतों के आत्मा और सर्वव्यापी होने के कारण विशालकाय बताए गए हैं यद्यपि काया से रहित हैं।उन अहंकाररूपी रूद्र की प्रत्येक शरीर से सम्बन्ध रखने वाली जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं,उन्ही को ज्ञानी पुरुष उन रुद्रदेव के पाँच मुख बतलाते हैं। इसीलिए ज्ञानेन्द्रियाँ सब ओर से प्रकाशस्वभाव कही गयी हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ(वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) तथा उनके पाँच विषय(बोलना, ग्रहण करना, विचरना, मलत्याग करना तथा विषयसुख की उपलब्धि कराना)-ये दस क्रमशः उनकी दायीं-बायीं भुजाएं हैं। सभी मुखों पर त्रिनेत्र अथवा तीन तीन आँख को इस प्रकार बतलाया गया है-
सत्व, रज, और तम-ये तीन गुण; भूत, भविष्य और वर्तमान-ये तीन काल; चित्त अहंकार और बुद्धि- ये त्रिविध अन्तःकरण; अ, उ और म-ये प्रणव के तीन अक्षर तथा ऋक, साम और यजुष्- ये तीन वेद ही उन भगवान रुद्रदेव के नेत्ररूप में स्थित हैं।उन्होंने अपनी मुट्ठी में त्रिलोकी रूप त्रिशूल धारण कर रखा है।
हमारे प्रतीक मूर्ति मात्र नही है अपितु उससे अधिक बहुत सारगर्भित है। यह सार हमें काल के गर्भ से निकलकर बाहर लाना है और सनातन धर्म को शर्म से बचाना है। हिन्दू होने पर गर्व करने का यह अर्थ नही है कि टीका लगाकर , त्रिशूल हाथ लेकर भीख मांगते फिरो। धर्म को समझो और समझाओ और विश्वकल्याण हेतु धर्म को प्रचारित व प्रसारित करो। जन जन का योगदान अपरिहार्य है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...