प्रतीकों में रमण करने वाले हिन्दुओं!क्या कभी इन प्रश्नों पर विचार किया है? तथाकथित पढ़े-लिखे लोग इस मूर्तियों को देखकर हँसते है। उनके हँसने का कारण भगवान शिव का वह स्वरूप ही नही है अपितु हमारे द्वारा उस स्वरूप को भगवान मान लेना है। हम उस प्रतीक में ही खुश है। उस मूर्ति के मुँह में लड्डू ठूँसकर भगवान की पूजा करके सन्तुष्ट हैं। न तो हम भगवान को जानने का प्रयास करते हैं और न हँसने वाले मूर्खों की जिज्ञासा शान्त कर सकते है। यही कारण है कि अपने धर्म से अनभिज्ञ हिन्दू धर्म से ही पलायन कर रहे हैं। दूसरे धर्म में व्याप्त पर्याप्त वासना उन्हें आकर्षित कर रही है।
अतः विद्वपुरुषों ! अपने धर्म के मर्म को समझो और अन्य को भी समझाओ। हमने इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आपसे अनुरोध है कि उसको प्रचारित करें। उपनिषदों के एक एक श्लोक को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम u tube पर भी हैं और इस ब्लॉग पर तो है ही।उपनिषद लिखकर u tube पर खोज करें और हमारा लिंक पाएं। इधर आज हम भगवान रूद्र के विषय में उठने वाले इन प्रश्नों के विषय में चर्चा कर रहें हैं। प्रमाण के लिए योगवशिष्ठ का अवलोकन किया जा सकता है।
जब भगवान शिव अहंकार के अभिमानी रूप से प्रकट होते हैं तो रूद्र कहलाते हैं। यद्यपि भगवान अमूर्त हैं, हम उनको आकाशरूपी भी कह सकते हैं,क्योंकि आकाश भी तो अमूर्त ही है।महाशून्य आकाश मूल रूप से काला है। तारों का अस्तित्व तो मात्र बिंदु समान ही है। उनका अथाह प्रकाश भी आकाश के कालेपन भरी रात्रि को छुपा नही सकता;हाँ , उसमे नीलापन अवश्य ला देता है । इसीलिए रूद्र के साथ साथ हमारे जितने भी ईश्वर के प्रतीक है सब काले या नीले दर्शाये जाते हैं।
चेतनाकाश मात्र ही उनका सारभूत स्वरूप है,इसलिए वे आकाशात्मा कहे गए हैं।सम्पूर्ण भूतों के आत्मा और सर्वव्यापी होने के कारण विशालकाय बताए गए हैं यद्यपि काया से रहित हैं।उन अहंकाररूपी रूद्र की प्रत्येक शरीर से सम्बन्ध रखने वाली जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं,उन्ही को ज्ञानी पुरुष उन रुद्रदेव के पाँच मुख बतलाते हैं। इसीलिए ज्ञानेन्द्रियाँ सब ओर से प्रकाशस्वभाव कही गयी हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ(वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ) तथा उनके पाँच विषय(बोलना, ग्रहण करना, विचरना, मलत्याग करना तथा विषयसुख की उपलब्धि कराना)-ये दस क्रमशः उनकी दायीं-बायीं भुजाएं हैं। सभी मुखों पर त्रिनेत्र अथवा तीन तीन आँख को इस प्रकार बतलाया गया है-
सत्व, रज, और तम-ये तीन गुण; भूत, भविष्य और वर्तमान-ये तीन काल; चित्त अहंकार और बुद्धि- ये त्रिविध अन्तःकरण; अ, उ और म-ये प्रणव के तीन अक्षर तथा ऋक, साम और यजुष्- ये तीन वेद ही उन भगवान रुद्रदेव के नेत्ररूप में स्थित हैं।उन्होंने अपनी मुट्ठी में त्रिलोकी रूप त्रिशूल धारण कर रखा है।
हमारे प्रतीक मूर्ति मात्र नही है अपितु उससे अधिक बहुत सारगर्भित है। यह सार हमें काल के गर्भ से निकलकर बाहर लाना है और सनातन धर्म को शर्म से बचाना है। हिन्दू होने पर गर्व करने का यह अर्थ नही है कि टीका लगाकर , त्रिशूल हाथ लेकर भीख मांगते फिरो। धर्म को समझो और समझाओ और विश्वकल्याण हेतु धर्म को प्रचारित व प्रसारित करो। जन जन का योगदान अपरिहार्य है।

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