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दिसंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

नव वर्ष का सही समय

क्या आपने दिल्ली की 26 जनवरी देखी है ?जिसमें सेना मार्च पास करती है।। मार्च क्या है ? कहीं मार्च कोई प्रारंभिक बिंदु तो नहीं है, जिसको पास करके मार्च पास किया जाता है? लगभग 3000 वर्ष पहले तो ऐसा ही था; जब मार्च प्रारंभ हुआ करता था किसी भी वर्ष का। केवल भारत भूमि पर ही नहीं बल्कि वैश्विक भूमि पर भी। तब सातवां महीना सितंबर था, आठवां महीना अक्टूबर था, नौवा महीना नवंबर था और दसवां महीना दिसंबर था। और 10 महीने का होता था वर्ष। लगभग सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जैनों के नाम पर एक महीना जनवरी बढ़ा दिया गया। जैनो एक ग्रीस देवता का नाम है । इस को बढ़ाने का काम फेबरा नामक व्यक्ति ने किया था। फेबरा ने अपने नाम से भी फरवरी नामक एक और महीना बढ़ा दिया; और इस तरह से हो गए 12 महीने। लगभग 46 ईसापूर्व में जूलियस सीजर ने 1 महीने का नाम अपने नाम पर रख दिया। यह था जुलाई। सीजर के बाद ऑगस्टीन नाम के एक राजा ने अपने नाम पर उससे अगले महीने का नाम अगस्त रखा। सीजर एक राजा था और उस के नाम वाले जुलाई माह में 31 दिन थे तो ऑगस्टीन क्यों पीछे रहता ? उसने भी फरवरी से एक दिन निकाला और इस प्रकार अगस्त में भी 31 दिन हो...

ईश्वरीय सन्तुलन और आधुनिक विज्ञान

सर्व विदित है कि मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है। पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश। इनमें किसी भी तत्व की महत्ता को न्यूनाधिक की तराजू में नहीं तोला जा सकता।। सभी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इन सबका एक संतुलित संगठन ही शरीर है। यह संतुलन जीवो को उम्र भर बनाकर रखना पड़ता है ।जब भी कभी संतुलन में असंतुलन उत्पन्न हुआ, तो समझो शरीर बीमारियों का घर बन गया। इसलिए समझदार मनुष्य सदैव इन पंचतत्वों को संतुलित बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्न शील रहते हैं। इन तत्वों का संतुलित संगठन ही सृष्टि है; और इनमें से किसी भी एक तत्व की अधिकता या न्यूनता ही विनाश है। हमारे अनुभव में प्रायः यह बातें आती रहती हैं। समुद्र तट पर जल प्रलय, पर्वतो में भूस्खलन, प्रायः जगह-जगह लग जाने वाली आग, वायु में प्रदूषण और अवकाश की कमी या अधिकता सभी कुछ जानलेवा है। इसलिए जरूरी है कि ना केवल हमें इन पंचतत्व का सही सही ज्ञान हो, अपितु इनके संतुलन को बनाए रखने के लिए भी ज्ञान और कर्मठता दोनों हों। हमारी सनातन परंपरा में इस बात को सृष्टि के आरंभ काल में ही समझ लिया गया था। तभी तो अग्नि विद्या का उद्घोष वेदों में उपलब्ध ह...

बीमारियों को ऐसे दूर रख सकते हैं

जैसे जैसे मनुष्य भौतिक सुख लोलुप होता जा रहा है, वैसे वैसे ही उसके जीवन में बीमारियों ने अपने तंबू नहीं, अपितु महल बना लिए हैं। आप अपने चारों तरफ से दृष्टि घुमाइए, कोई भी व्यक्ति आप को पूर्ण रुप से स्वस्थ नहीं मिलता। क्या सदियों से बीमारियां हमारे पीछे इसी प्रकार से पड़ी हुई है? नहीं!! जब मन शांत था,तमोगुण मनुष्य से दूर था, उस समय बीमारियां भी हम से दूर ही थी। किंतु जैसे जैसे हम सुविधाभोगी हुए, हमने अपने शरीर को नकारा बना डाला। खाली पड़े घरों में अक्सर कुत्तों का डेरा हो जाता है, वही हाल हमारे शरीर के साथ भी हो रहा है। हमारा मन, हमारा तन, सब कुछ भोग विलास में कमजोर हो चुका है। यही कारण है कि व्याधियां हमें हर ओर से घेरे हुए हैं। मनुष्य में जैसे-जैसे बुद्धि का विकास हुआ, उसने प्रकृति से बहुत कुछ सीखा है। सबसे बड़ी बात उसने मेहनत करके खाना सीखा है। किंतु जब से मनुष्य ने दूसरे के भोजन को छीन कर अपना भोजन मानना शुरू कर दिया है, तभी से मनुष्य के शरीर में बीमारियों ने अपना घर करना शुरू कर दिया है। क्या हम अपने आपको इन बीमारियों से, इन व्याधियों से, दूर कर सकते हैं? डॉक्टरों के पास इसका ...

सुनें अनहद नाद

ब्रह्मण्ड महाशून्य होते हुए भी पदार्थसमूहों से भरा हुआ है। पदार्थ है तो गति है।गति है तो घर्षण है।घर्षण है तो कम्पन्न है।कम्पन्न है तो आवाज है। विभिन्न अवर्त्तियों, गुणवत्ता और तीव्रताओं कि आवाज नाद कहलाती है। अनन्त ब्रह्मांड में नाद भी अनन्त हैं। कुछ मनुष्य को सुनाई देते हैं।कुछ मनुष्य की सुनने की क्षमता से नीचे से गुजर जाते हैं; और कुछ मनुष्य की सुनने की क्षमता से ऊपर से गुजर जाते है। इनमें से कुछ नादों को हम वैज्ञानिक विधि से पकड़ भी लेते है। विश्व मे कुछ ऐसे भी जन्तु हैं जो उन नादों को आसानी से पकड़ लेते है जिन्हें हमारी स्रोत इंद्रियां पकड़ नहीं पाती। इन्ही नादों में से कुछ नादों को बहुत सीमित मात्रा में लेकर हमारे पूर्वजों ने भाषा का निर्माण किया है।विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नाद हैं। कुछ दूसरी भाषा के नादों से मेल भी खाते है और कुछ मेल नही भी खाते है। क्या आप कल्पना कर सकते है कि बिना पदार्थ के भी नाद उत्पन्न हो सकता है।नही कर सकते क्योंकि हमारी इन्द्रियों की पहुँच जहाँ तक होती है वहीं तक का हमें ज्ञान होता है।और कल्पना ज्ञान से बाहर तो जा नही सकती। किन्तु यदि हम इन्द्रियों से...