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ईश्वरीय सन्तुलन और आधुनिक विज्ञान


सर्व विदित है कि मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है। पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश। इनमें किसी भी तत्व की महत्ता को न्यूनाधिक की तराजू में नहीं तोला जा सकता।। सभी समान रूप से महत्वपूर्ण है। इन सबका एक संतुलित संगठन ही शरीर है। यह संतुलन जीवो को उम्र भर बनाकर रखना पड़ता है ।जब भी कभी संतुलन में असंतुलन उत्पन्न हुआ, तो समझो शरीर बीमारियों का घर बन गया। इसलिए समझदार मनुष्य सदैव इन पंचतत्वों को संतुलित बनाए रखने के लिए सतत प्रयत्न शील रहते हैं।
इन तत्वों का संतुलित संगठन ही सृष्टि है; और इनमें से किसी भी एक तत्व की अधिकता या न्यूनता ही विनाश है। हमारे अनुभव में प्रायः यह बातें आती रहती हैं। समुद्र तट पर जल प्रलय, पर्वतो में भूस्खलन, प्रायः जगह-जगह लग जाने वाली आग, वायु में प्रदूषण और अवकाश की कमी या अधिकता सभी कुछ जानलेवा है। इसलिए जरूरी है कि ना केवल हमें इन पंचतत्व का सही सही ज्ञान हो, अपितु इनके संतुलन को बनाए रखने के लिए भी ज्ञान और कर्मठता दोनों हों। हमारी सनातन परंपरा में इस बात को सृष्टि के आरंभ काल में ही समझ लिया गया था। तभी तो अग्नि विद्या का उद्घोष वेदों में उपलब्ध है। कठोपनिषद में कहां गया है--
अग्नि विद्या को जानकर 3 बार उसका अनुष्ठान करने वाला जो कोई भी विद्वान पुरुष अग्नि का चयन करता है, वह मृत्यु के पाश को अपने सामने ही काट कर शोक से पार होकर स्वर्ग लोक का आनंद अनुभव करता है।

किंतु विज्ञान द्वारा प्रशस्त विकास के मार्ग में अंधे होकर रेल की तरह एक रेखीय दौड़ने वाले आधुनिक समाज ने विकास के नाम पर इन विद्याओं का अपमान किया है। इसका परिणाम भी लगातार भुगत रहे हैं, किंतु यह मानने को तैयार नहीं है कि यह दुष्परिणाम उनके तथाकथित विकास के कारण है। विकास मानव का होना चाहिए। मानव के आत्मा का होना चाहिए। संसाधनो का विकास क्या सचमुच में विकास है? यह सीधी रेखा विनाश पर जाकर समाप्त होती है। विकास के दुष्परिणाम हम चारों ओर देख रहे हैं। प्रकृति बार बार संकेत देकर हमें सचेत करती है और हमे उन संकेतों को समझने की आवश्यकता है। आज का विज्ञान भी इस बात को मानने लगा है प्रकृति संतुलन है और इस संतुलन को यदि बिगाड़ा गया तो इसका एक ही परिणाम है;' महाप्रलय'। वेदों में इस सन्तुलन को 'ऋत' कहा गया है । ईश्वरीय न्याय व्यवस्था अर्थात ऋत में जितना मानवीय हस्तक्षेप होगा, उतना ही प्रभावी विनाश होगा। यह महाविनाश रोकने का उत्तरदायित्व हमारा है; और इसके लिए एक बड़े आध्यात्मिक आंदोलन की आवश्यकता है। आशा करता हूं कि समय रहते मानव सचेत हो जाएगा और विज्ञान के अन्य आयामों पर भी विचार करके स्वयं के विनाश के निमंत्रण से स्वयं को दूर कर लेगा।
मैं ही ईश्वर हूँ।

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