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नव वर्ष का सही समय


क्या आपने दिल्ली की 26 जनवरी देखी है ?जिसमें सेना मार्च पास करती है।। मार्च क्या है ? कहीं मार्च कोई प्रारंभिक बिंदु तो नहीं है, जिसको पास करके मार्च पास किया जाता है? लगभग 3000 वर्ष पहले तो ऐसा ही था; जब मार्च प्रारंभ हुआ करता था किसी भी वर्ष का। केवल भारत भूमि पर ही नहीं बल्कि वैश्विक भूमि पर भी। तब सातवां महीना सितंबर था, आठवां महीना अक्टूबर था, नौवा महीना नवंबर था और दसवां महीना दिसंबर था। और 10 महीने का होता था वर्ष। लगभग सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व में जैनों के नाम पर एक महीना जनवरी बढ़ा दिया गया। जैनो एक ग्रीस देवता का नाम है । इस को बढ़ाने का काम फेबरा नामक व्यक्ति ने किया था। फेबरा ने अपने नाम से भी फरवरी नामक एक और महीना बढ़ा दिया; और इस तरह से हो गए 12 महीने। लगभग 46 ईसापूर्व में जूलियस सीजर ने 1 महीने का नाम अपने नाम पर रख दिया। यह था जुलाई। सीजर के बाद ऑगस्टीन नाम के एक राजा ने अपने नाम पर उससे अगले महीने का नाम अगस्त रखा। सीजर एक राजा था और उस के नाम वाले जुलाई माह में 31 दिन थे तो ऑगस्टीन क्यों पीछे रहता ? उसने भी फरवरी से एक दिन निकाला और इस प्रकार अगस्त में भी 31 दिन हो गए। किन्तु नव वर्ष का प्रारंभ 25 मार्च से हुआ करता था। वर्षों बीत गए कैलेंडर में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया।
क्या आपको पता है कि कलेंडर शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई? इसके पीछे है एक दिलचस्प राज।।
जब कोई खगोलीय घटना घटती थी जैसे कि चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण आदि , तो कोई पुजारी या गणमान्य व्यक्ति चिल्लाकर सबको इसकी सूचना देता था। तब फोन नहीं थे ना...., इसलिए चिल्लाकर कॉल की जाती थी। और उसी कॉल से कैलेंडर शब्द की उत्पत्ति हुई है।
हम बात कर रहे थे वर्ष के प्रारंभ की। सन 1752 ई. में इंग्लैंड की संसद में एक कैलेंडर बिल पास हुआ जिसमें कहां गया कि नव वर्ष इंग्लैंड के तत्कालीन राजा के जन्मदिन अर्थात 1 जनवरी से प्रारंभ किया जाएगा न कि 25 मार्च से । और बस फिर क्या था?? 1 जनवरी बन गया नए वर्ष का प्रथम दिन। इसके पीछे कोई वैज्ञानिक, आध्यात्मिक या खगोलीय कारण नहीं है। कुहासे भरी ठंड में ठिठुरते हुए नव वर्ष मनाना बेवकूफी भरे पागलपन के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं है।

नव वर्ष तो हिंदू पंचांग के अनुसार ही समय पर होता है । जब प्रकृति नया श्रंगार कर रही होती है , चारों और फूल खिले होते हैं, बसंत कामदेव के साथ मस्ती कर रहा होता है और कामदेव रति के साथ क्रीडा कर रहे होते हैं। पूरी प्रकृति में कामक्रीड़ा होती है; नया उल्लास होता है; नई उमंग होती है; नई खुशियां होती है; नया सृजन प्रारम्भ होता है; नए फल उगने प्रारंभ होते हैं; नए बीज बनने प्रारंभ होते हैं; नए पत्ते पेड़ों की शोभा बनते लगते हैं। सही नववर्ष तो वही है।
क्यों ऐसी ठंड में ठिठुर ठिठुर कर पागलों की तरह दौड़े जा रहे हो पार्टियों में, सड़कों पर,नाच गानों में, शराबखानों में । अरे भाई! नववर्ष मनाओ, लेकिन तभी जब नव वर्ष का समय सही हो, न कि किसी सनकी राजा के जन्मदिन को नव वर्ष के रूप में सेलिब्रेट करें। अपनी संस्कृति के अनुरूप शालीनता से,उल्लास से, प्रकृति के साथ मिलकर प्रसन्नता पूर्वक नववर्ष मनाओ। ठण्ड में मरने से खुद भी बचो ओर दूसरों को भी बचाओ। यदि मेरी बात गलत लगे तो आलोचना करने के लिए संविधान ने आपको अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का अधिकार दिया ही है। और सही लगे तो आगे बढ़ाएं।
विक्रम सिंह चौहान

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