नहीं!! जब मन शांत था,तमोगुण मनुष्य से दूर था, उस समय बीमारियां भी हम से दूर ही थी। किंतु जैसे जैसे हम सुविधाभोगी हुए, हमने अपने शरीर को नकारा बना डाला। खाली पड़े घरों में अक्सर कुत्तों का डेरा हो जाता है, वही हाल हमारे शरीर के साथ भी हो रहा है। हमारा मन, हमारा तन, सब कुछ भोग विलास में कमजोर हो चुका है। यही कारण है कि व्याधियां हमें हर ओर से घेरे हुए हैं।
मनुष्य में जैसे-जैसे बुद्धि का विकास हुआ, उसने प्रकृति से बहुत कुछ सीखा है। सबसे बड़ी बात उसने मेहनत करके खाना सीखा है। किंतु जब से मनुष्य ने दूसरे के भोजन को छीन कर अपना भोजन मानना शुरू कर दिया है, तभी से मनुष्य के शरीर में बीमारियों ने अपना घर करना शुरू कर दिया है।
क्या हम अपने आपको इन बीमारियों से, इन व्याधियों से, दूर कर सकते हैं? डॉक्टरों के पास इसका स्थाई इलाज नहीं है। इसके लिए तो हमें अपने अंदर जो ईश्वर ने विश्व की सबसे बड़ी फार्मेसी कंपनी; यह शरीर बनाया है, इसी को मजबूत करना होगा। क्योंकि शरीर व्याधियों से यथासंभव युद्ध करता है। इसलिए हमने इस शरीर स्वरूपी सैनिक को ही दृढ़ करना होगा। अरे भाई हम मनुष्य हैं कुत्ते नहीं हैं।
किसी ने कुत्ते से पूछा ,"तुझसे बढ़कर नीच कौन है ?" ऐसा प्रश्न करने वाले से कुत्ते ने हंसकर कहा," जो मूर्खता( अज्ञान ),अपवित्र देह का अभिमान तथा अंधता (विचार रूपी दृष्टि से वंचित होना)--- इन दुर्गुणों का एवं अशुभ वस्तु का सेवन करता है, वह मुझ से भी अधिक नीच है । प्रश्न करने वाले ने फिर पूछा ,"तुझ में कौन से ऐसे गुण हैं जिसके कारण तुझे मूर्ख से अच्छा समझा जाए?" कुत्ते ने उत्तर दिया," शूरता, स्वाभाविक स्वामी भक्ति और धृति( थोड़े में ही संतोष कर लेने की क्षमता) यह सुंदर गुण जो मुझ में है लाखों प्रयत्न करके ढूंढने पर भी मूर्खों के पास नहीं पाए जा सकते ।"
हमेशा मूर्खता से बाहर निकलकर सत्यता का जीवन अपनाना होगा। हमें प्रकृति के साथ प्रेम पूर्वक रहना सीखना होगा। हमें दोहन प्रकृति का नहीं करना है, अपितु अपने दुर्गुणों का करना है, ताकि उनको नष्ट किया जा सके। प्रकृति हमारी सहचरी है। उसके साथ हमारा जीवन और हमारे साथ प्रकृति का जीवन है। इसलिए प्रकृति को तो संगिनी की तरह पोषना है। हमारे अंदर की आध्यात्मिक गुण ही हमें बाहर की व्याधियों से दूर रख सकते हैं। इसलिए आओ वेदों के उस उद्घोष को अपने मन और जीवन में उतारें---
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषे छतमसमः।
अर्थात शास्त्रों में बताए गए कर्मों को, अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करनी चाहिए।

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