इन्ही नादों में से कुछ नादों को बहुत सीमित मात्रा में लेकर हमारे पूर्वजों ने भाषा का निर्माण किया है।विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नाद हैं। कुछ दूसरी भाषा के नादों से मेल भी खाते है और कुछ मेल नही भी खाते है।
क्या आप कल्पना कर सकते है कि बिना पदार्थ के भी नाद उत्पन्न हो सकता है।नही कर सकते क्योंकि हमारी इन्द्रियों की पहुँच जहाँ तक होती है वहीं तक का हमें ज्ञान होता है।और कल्पना ज्ञान से बाहर तो जा नही सकती। किन्तु यदि हम इन्द्रियों से परे जाएं तो सम्भवतः यह नाद सुन भी पाएं!!
लेकिन इन्द्रियों से परे जाना गूढ़ आध्यात्मिक विषय है और इसका दुर्लभतम पथ है। हमारे महान ऋषि-मुनियों ने योगबल से इन्द्रियों की सीमा पार करने का भरसक प्रयत्न किया है।उन्होंने ईश्वर के साथ साथ उस नाद की खोज का भी प्रयत्न किया है।और कहीं न कहीं वे सफल भी हुए हैं। तभी तो नाद के दो प्रकार दृढ़ता से बतलायें है-- एक आहत नाद ( दो पदार्थों के टकराने से उत्पन्न नाद) और दूसरा अनहद नाद(ब्रह्मांड में शून्य में गूँजने वाला नाद)। जब ऋषियों ने इस दिव्य अनहद नाद को समझने की कोशिश की तो बुद्धि की सीमितता के कारण इतना ही बता पाए कि इसमें अ उ ओर म अर्थात ॐ जैसी ध्वनि निसृत होती है। इसीलिए तो ॐ सभी श्रुतियों ने महाशब्द व महावाक्य दोनों के रूप में निरूपण किया है।ॐ अर्थात अनहद नाद अमरत्व प्रदान करने वाला नाद है ।यही कारण है कि ॐ नाम का जाप शरीर की मानसिक और शारीरिक व्याधियों का ही विनाश नही करता अपितु आध्यात्मिक शांति भी प्रदान करता है। ॐ का सही उच्चारण हमें अनहद नाद के सुरों में गोता लगवा देता है। ।
तो सनातन मन के पोषकों
ॐ जपो; ॐ जपो; ॐ जपो


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