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शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन


चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है।
निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का जीवन है।वह स्वयं ही जगत के रूप में परिणत होने के कारण समस्त सृष्टि की प्रकृति(उपादान)है। दृश्याभासों में अनुभूत होने वाले उत्पाद्य,आप्य, संस्कार्य और विकार्यरुपी चार प्रकार के फलों का संपादन करने से वही क्रिया भी कहलाती है। ब्राह्मांड रूप धारण करने वाली वह शक्ति या काली प्रलय काल में जब समुद्र आदि के जल से भीगी होती है तब बड़वाग्नि की शिखा के समान अपने वाले ग्रीष्म ऋतु के प्रचंड सूर्य आदि की ज्योतियां से सुखाई जाती है इसीलिए इसे "शुष्का" भी कहते हैं। दुष्टों पर स्वभावतः अत्यंत क्रोध करने के कारण वह 'चंडिका' कही गई है। उसकी अंग कांति उत्पल नील कमल के समान है इसीलिए उसका नाम 'उत्पला' भी है। एकमात्र जय में प्रतिष्ठित होने के कारण उसे 'जया' कहा गया है। सिद्धियों का आश्रय होने से वह 'सिद्धा' कही गई है।चूँकि जया है, इसलिए 'जयन्ती'भी है। विजय का आधारभूत होने से उसे 'विजया' कहा गया है। अत्यंत पराक्रम के कारण वह 'अपराजिता' नाम से प्रसिद्ध है।उसका निग्रह करना किसी के लिए भी दुष्कर है इसलिए उसका नाम 'दुर्गा'है।ओंकार की सारभूता होने से वह 'उमा'कही गयी है।अपने मन्त्र का गान करने वालों के लिए त्राणकारक तथा परमपुरुषार्थ होने से उस देवी का नाम 'गायत्री'है।जगत के प्रसव की भूमि होने से उस जगजननी का नाम 'सावित्री' है। स्वर्ग और अपवर्ग के साधनभूत कर्म उपासना एवं ज्ञानमयी दृष्टियों का प्रसार करने से उस देवी को सरस्वती कहा गया है। पार्वती रूप में उस देवी के अंग और शरीर अत्यंत गौर हैं, इसलिए वह 'गौरी' कहलाती है। वह महादेवजी के आधे शरीर से संयुक्त है। सुप्त और जाग्रत जितने भी त्रिभुवन के प्राणी हैं,उनके हृदय में नित्य निरन्तर अकारादि मात्राओं से रहित शब्दब्रह्म(प्रणव)के नाद का उच्चारण होता रहता है। वह नाद अर्द्धमात्रा होने से 'इंदुकला' कहलाता है।वह इंदुकला ही 'उमा'है। शिव और शिवा (रुद्र और काली)दोनों ही आकाशरूप है अतः उनका शरीर काला दिखाई देता है।इसीलिए उन्हें कालभैरव और काली कहते हैं।
...योगवशिष्ठ से साभार

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