प्राचीन काल में इस पर मंथन नही किया गया था। कदाचित उस समय के जनसमुदाय जिस विचारधारा में जी रहे थे उसमें ऐसे चिन्तन का कोई ओचित्य भी नही था। मानव मानवों से अधिक ऋणी तो प्रकृति का था या यूँ कहें कि समझता था।यद्यपि 'समझता था' आज के परिप्रेक्ष में है। उस समय के परिप्रेक्ष में तो 'था' ही उचित है। इसलिए वह सदैव प्रकृति से उऋण होने के उपाय पर ही चिन्तन करता था। प्रारम्भिक ऋग्वेद तो इसी और संकेत करता है। वृक्षों, नदियों, तालाबों, वायु, अग्नि, धरती, आकाश आदि के ऋण से मुक्ति पाना मोक्ष था।इसीलिए उन सब को देवत्व प्राप्त था तथा उनका स्तुतिगान मानव का परमकर्तव्य था। धीरे धीरे मानव प्रकृति से ऊपर उठकर प्रकृति नियंता की आराधना करने लगा । वह लगातार अपने चिन्तन का विकास कर रहा था और जीवन में सुख, समृद्धि और समरसता लाने के लिए एक परमशुभ की खोज में था। वह उसे जाकर मिला उपनिषद काल में। जब एक ब्रह्म और अद्वैत की चरम सीमा पर मानव पहुँच गया। मानव की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि जब वह निकृष्ट के सम्पर्क में रहता है तो उत्कृष्ट की आकांक्षा रखता है और जब उत्कृष्ट की प्राप्ति हो जाती है तो उसे संभ...