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सितंबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्राद्ध

प्राचीन काल में इस पर मंथन नही किया गया था। कदाचित उस समय के जनसमुदाय जिस विचारधारा में जी रहे थे उसमें ऐसे चिन्तन का कोई ओचित्य भी नही था। मानव मानवों से अधिक ऋणी तो प्रकृति का था या यूँ कहें कि समझता था।यद्यपि 'समझता था' आज के परिप्रेक्ष में है। उस समय के परिप्रेक्ष में तो 'था' ही उचित है। इसलिए वह सदैव प्रकृति से उऋण होने के उपाय पर ही चिन्तन करता था। प्रारम्भिक ऋग्वेद तो इसी और संकेत करता है। वृक्षों, नदियों, तालाबों, वायु, अग्नि, धरती, आकाश आदि के ऋण से मुक्ति पाना मोक्ष था।इसीलिए उन सब को देवत्व प्राप्त था तथा उनका स्तुतिगान मानव का परमकर्तव्य था। धीरे धीरे मानव प्रकृति से ऊपर उठकर प्रकृति नियंता की आराधना करने लगा । वह लगातार अपने चिन्तन का विकास कर रहा था और जीवन में सुख, समृद्धि और समरसता लाने के लिए एक परमशुभ की खोज में था। वह उसे जाकर मिला उपनिषद काल में। जब एक ब्रह्म और अद्वैत की चरम सीमा पर मानव पहुँच गया। मानव की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि जब वह निकृष्ट के सम्पर्क में रहता है तो उत्कृष्ट की आकांक्षा रखता है और जब उत्कृष्ट की प्राप्ति हो जाती है तो उसे संभ...

RTI लगाने का तरीका

_RTI_ लगाने का तरीका* 👉🏿RTI मलतब है सूचना का अधिकार - ये कानून हमारे देश में 2005 में लागू हुआ। जिसका उपयोग करके आप सरकार और किसी भी विभाग से सूचना मांग सकते है। आमतौर पर लोगो को इतना ही पता होता है। परंतु आज मैं आप को इस के बारे में कुछ और रोचक जानकारी देता हूँ - 👉🏿RTI से आप सरकार से कोई भी सवाल पूछकर सूचना ले सकते है। 👉🏿RTI से आप सरकार के किसी भी दस्तावेज़ की जांच कर सकते है। 👉🏿RTI से आप दस्तावेज़ की प्रमाणित कापी ले सकते है। 👉🏿RTI से आप सरकारी कामकाज में इस्तेमाल सामग्री का नमूना ले सकते है। 👉🏿RTI से आप किसी भी कामकाज का निरीक्षण कर सकते हैं। 👉🏿RTI में कौन- कौन सी धारा हमारे काम की है। 👉🏿धारा 6 (1) - RTI का आवेदन लिखने का धारा है। 👉🏿धारा 6 (3) - अगर आपका आवेदन गलत विभाग में चला गया है। तो वह विभाग इस को 6 (3) धारा के अंतर्गत सही विभाग मे 5 दिन के अंदर भेज देगा। 👉🏿धारा 7(5) - इस धारा के अनुसार BPL कार्ड वालों को कोई आरटीआई शुल्क नही देना होता। 👉🏿धारा 7 (6) - इस धारा के अनुसार अगर आरटीआई का जवाब 30 दिन में नहीं आता है तो सूचना निशुल्क में दी जाएग...

बिजली, फिल्म और शौचालय

बिजली की आँख मिचौली में, रविवार की फिल्म का, किरकिरा होता मजा; किन्तु शोंक का करें क्या?? दो ही शोंक थे बालपन के, खेलना, बेसब्री से रविवार की बाट जोहना; शनिवार की साप्ताहिकी के बाद, रविवार की हिन्दी फ़ीचर फिल्म के लिए, फूलों सजी राहों में पलके बिछाना; किन्तु बिजली???? फिल्म का पहला गीत आया नही कि गुल; दौड़ते खेल के मैदान की और, मन्द मन्द परिहास से मुँह चिढ़ाता चाँद, कि अचानक जलते बल्ब, और गाँव में उठता बच्चों का सुख क्रन्दन; पाँव धरा को न छूते, सब की दौड़ की एक ही मंजिल, वह घर जहाँ शादी में आया था नया टी वी; बिजली आने पर फिल्म का कोई भाग छूट न जाये; उधर मार्ग में कतारबद्ध बैठी महिलाएँ, एक पल के लिए खड़ी होती मुँह फिराकर, कि अस्मत न जाये बह , चाँद के मन्दम आलोक की नदी में, नाक को नाहक मिलती सजा की कहाँ थी फ़िक्र? मन तो फिल्म की कथा पर होता, खलनायक की पिटाई पर; तब सचमुच बच्चे थे , हाँ बच्चे ही; शुलभ शौचालय की खोज तो हो चुकी थी; किन्तु जाग्रति न थी। घर में शौचालय सुलभ कराने से, मार्ग के किनारे विकल्प सुलभ था, किन्तु चाँद का मन्दम परिहास, हम पर नही था लक्षित, इ...

जिह्वा पर ताला

मेरी चुप्पी में मेरी जिह्वा का सार है, नाशवान है जगत ,सङ्ग ही असार है। पतली अनन्त परतों में छिपा कर के ज्ञान को, माया समझी है कि अब उसकी ही सरकार है।। एक समंदर में बना कोई पिंड बर्फ का, साँस भरे तो कहे कि जल उसका आहार है। वह स्वयं जल नही, जलसे अलग है सर्वथा, मूर्ख ना माने यह कि जल ही सृष्टिसार है। मैं भी क्या नही हूँ वैसा ही पिंड एक, भ्रम जगतजाल है, सत्य पर वार है।। कैसे शल्य करे वह असत पर सत्य की? चिकित्सक ही भ्रमरोग से पड़ा बीमार है। यदि खोल भी दूँ जिह्वा पर लटका ताला, सुनेगा कौन?जन जन में माया की रसधार है। हूँ सनातन किन्तु, प्रयत्न रहेगा सदा; कर्तव्य पालन पर तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।।

हिन्दी दिवस नहीं, अंग्रेजी निषेध दिवस

सितम्बर माह हिन्दी भाषा के लिए चिन्तित रहने वाले लोगों के लिए एक आशा किरण लेकर आता है। हिन्दी के प्रसार और विकास के नए नए संदर्श प्रस्तुत किये जाते हैं।मीडिया की भूमिका पर बहस होती है। साहित्यक जगत के लोगों की व्यस्तताएं चरम पर होती है। सब हिन्दी को जनमानस से जोड़ने की जुगत में लग जाते हैं। सितम्बर गया नही कि पुनः अंग्रेजी देवी की अर्चना आरम्भ हो जाती है। केवल हिन्दी के लिए ही विशेष पखवाड़ा और दिवस क्यों? क्या अन्य भारतीय भाषाओं को विकास और प्रसार का अधिकार नही है? संस्कृत की जीवित बहन भाषा तमिल है। त्रेता युग में वनगमन के समय श्री राम ने महाऋषि अगस्त से तमिल भाषा की शिक्षा प्राप्त की थी। इस भाषा के प्रसार के लिए हमारे बुद्धिजीवी, तंत्र और सरकार क्या कर रहें है? अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के 70 वर्ष बाद भी हम अंग्रेजी की दासता से मुक्त क्यों नही हो सके हैं? विज्ञान वर्ग से सम्बंधित पाठ्यक्रम पूरे देश में प्रायः अंग्रेजी में ही पढ़ाया जाता है। 70 वर्षों में क्या हम इस योग्य भी नही हो सके हैं कि ज्ञान-विज्ञान की नई जानकारियों को अपनी भाषा में अनुवादित करके अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा ...

गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस

5 सितंबर के दिन पूरे देश में शिक्षक दिवस की बधाइयाँ गूँज रही थी। सारा सोशल मीडिया डॉ. राधाकृष्णन जी के फोटो और संदेशों से भरा हुआ था। प्रत्येक देशवासी गर्व के क्षणों में गोता लगा रहा था। डॉ.राधाकृष्णन जी के विचारों को जहाँ-तहाँ तरह तरह से उल्लेख किया जा रहा था। डा. राधाकृष्णन माँ भारती के महान सपूतो में से एक हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति और दर्शन को उस दौर में विश्व के लोगों तक पहुँचाया जब हिन्दू स्वयं को हिन्दू बताने में शर्म का अनुभव किया करता था। हिन्दू 1000 वर्षों की दासता के बोझ तले इतना दब चुका था कि उस मानसिकता से निकलने की चाहत ही पूर्णतः खो चुकी थी। ऐसे में हिन्दू समाज की अवैदिक रूढ़ियों के विरुद्ध देश में ऋषि दयानन्द और राजा राम मोहन राय जैसे महापुरुषों ने संग्राम छेड़ दिया तो वेदों की सच्चाइयों को विवेकानन्द जी और राधाकृष्ण जी के द्वारा आंग्लभाषा में दूर देशों तक पहुँचाया। इसलिए अन्य महापुरुषों के संग डॉ. राधाकृष्णन आदरणीय है किन्तु उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के ओचित्य पर संशय है। क्या उनसे पहले भारतीय इतिहास में शिक्षक नही हुए ? परशुराम, गुरु द्रोण , गु...