धीरे धीरे मानव प्रकृति से ऊपर उठकर प्रकृति नियंता की आराधना करने लगा । वह लगातार अपने चिन्तन का विकास कर रहा था और जीवन में सुख, समृद्धि और समरसता लाने के लिए एक परमशुभ की खोज में था। वह उसे जाकर मिला उपनिषद काल में। जब एक ब्रह्म और अद्वैत की चरम सीमा पर मानव पहुँच गया।
मानव की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि जब वह निकृष्ट के सम्पर्क में रहता है तो उत्कृष्ट की आकांक्षा रखता है और जब उत्कृष्ट की प्राप्ति हो जाती है तो उसे संभालने में भी असफल हो जाता है। पर्वतचोटी यदि लक्ष्य हो तो भी वहाँ कुछ देर ठहरने के पश्चात अधोगमन प्रारम्भ हो जाता है।
कदाचित इसी क्रम में मानव प्रकृति पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानने लगा और ऋण का प्रत्यय उससे दूर न हो सका। फिर वह देवताओं का कृतघ्न होने लगा, तदुपरांत राजाओं का और उसके बाद उसे लगा कि देव भी अन्यपुरुष है और राजा भी। तो क्यों न उन के ऋण से भी मुक्ति का मार्ग खोजा जाये जो अपने ही पूर्वज हैं। बस! यहीं से एक नया मंथन आरम्भ हुआ और पुराणकाल में इसके लिए विधिनिर्धारण भी हो गया। अतः मानव अब उनके ऋण से मुक्ति के लिए पिण्डदान करने लगा जिनका वास्तव में कोई ऋण था ही नही। पूर्वजों की मुक्ति तो उनके संकल्प स्वातंत्र्य और विहित कर्मों पर आधारित थी किन्तु उनकी मुक्ति के लिए अगली पीढ़ी दान करने लगी।
सम्भवतः यह प्रथा बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव के पश्चात प्रारम्भ हुई । क्योंकि बौद्धों ने बुद्ध की मूर्ति सम्मुख रखकर उसका पूजन प्रारम्भ कर दिया जिसने बड़ी संख्या में लोगों को अपनी और आकृष्ट किया। इसके प्रत्युत्तर में ब्राह्मणों ने भी सांस्कृतिक एकता के लिए ऐसा ही एक अधम मार्ग चाहिए रहा तो उन्होंने अपने सभी आदर्श पुरुषों और देवों को मूर्तियों के पूजन के साथ साथ पूर्वजों के प्रति अपनी कृतघ्नता प्रदर्शित करने हेतु वर्ष में एक पखवाड़ा उनके नाम कर दिया और इस प्रकार श्रद्धा श्राद्ध के रूप में हमारे सम्मुख उपस्थित हुई।
ईश्वर सब का श्राद्ध ग्रहण करें व सबको सद्बुद्धि दे।
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