नाशवान है जगत ,सङ्ग ही असार है।
पतली अनन्त परतों में छिपा कर के ज्ञान को,
माया समझी है कि अब उसकी
ही सरकार है।।
एक समंदर में बना कोई पिंड बर्फ का,
साँस भरे तो कहे कि जल उसका आहार है।
वह स्वयं जल नही, जलसे अलग है सर्वथा,
मूर्ख ना माने यह कि जल ही सृष्टिसार है।
मैं भी क्या नही हूँ वैसा ही पिंड एक,
भ्रम जगतजाल है, सत्य पर वार है।।
कैसे शल्य करे वह असत पर सत्य की?
चिकित्सक ही भ्रमरोग से पड़ा बीमार है।
यदि खोल भी दूँ जिह्वा पर लटका ताला,
सुनेगा कौन?जन जन में माया की रसधार है।
हूँ सनातन किन्तु, प्रयत्न रहेगा सदा;
कर्तव्य पालन पर तो मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।।
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