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हिन्दी दिवस नहीं, अंग्रेजी निषेध दिवस


सितम्बर माह हिन्दी भाषा के लिए चिन्तित रहने वाले लोगों के लिए एक आशा किरण लेकर आता है। हिन्दी के प्रसार और विकास के नए नए संदर्श प्रस्तुत किये जाते हैं।मीडिया की भूमिका पर बहस होती है। साहित्यक जगत के लोगों की व्यस्तताएं चरम पर होती है। सब हिन्दी को जनमानस से जोड़ने की जुगत में लग जाते हैं। सितम्बर गया नही कि पुनः अंग्रेजी देवी की अर्चना आरम्भ हो जाती है।
केवल हिन्दी के लिए ही विशेष पखवाड़ा और दिवस क्यों? क्या अन्य भारतीय भाषाओं को विकास और प्रसार का अधिकार नही है? संस्कृत की जीवित बहन भाषा तमिल है। त्रेता युग में वनगमन के समय श्री राम ने महाऋषि अगस्त से तमिल भाषा की शिक्षा प्राप्त की थी। इस भाषा के प्रसार के लिए हमारे बुद्धिजीवी, तंत्र और सरकार क्या कर रहें है?
अंग्रेजों की दासता से मुक्ति के 70 वर्ष बाद भी हम अंग्रेजी की दासता से मुक्त क्यों नही हो सके हैं? विज्ञान वर्ग से सम्बंधित पाठ्यक्रम पूरे देश में प्रायः अंग्रेजी में ही पढ़ाया जाता है। 70 वर्षों में क्या हम इस योग्य भी नही हो सके हैं कि ज्ञान-विज्ञान की नई जानकारियों को अपनी भाषा में अनुवादित करके अपने बच्चों को उनकी मातृभाषा में सहज उपलब्ध करा दिया जाये?
कब तक भाषाओं से समृद्ध इस देश की भाषाओं को आत्मसम्मान से दूर रखकर इन्हें कुंठित रखा जायेगा? कब तक उत्तर और दक्षिण भारत के राज्य अपने निजी राजनैतिक स्वार्थों की अग्नि में भारतीय भाषाओं को दहते रहेंगे? क्या कारण है कि अपनी इतनी भाषाओं को छोड़कर एक बाहरी भाषा भिन्नभाषी भारतीयों को जोड़ने का काम करती है?
मैं नही समझता कि हमें हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा मनाने के नाम पे गोष्ठियों के नाटक करने की आवश्यकता है। हम सब भारतीय है और मेरे भारत की सभी भाषाएँ सम्मानीय हैं। इसलिए हमें भारतीय भाषा दिवस मनाना चाहिए। भारतीय भाषा पखवाड़े का आयोजन करना चाहिए। इसमें पूरे मीडिया की सक्रिय भूमिका भी होनी चाहिए। अपने कार्यक्रमों के साथ साथ अन्य भाषाओं का ज्ञान भी अपने दर्शकों और पाठकों को कराए। जिस प्रकार हिंदी के अखबार और कुछ चैनल अंग्रेजी सिखाने के कॉलम व विशेष कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं उसी प्रकार अन्य भारतीय भाषाओं को सिखाने का भी प्रबन्ध होना चाहिए।
यदि विकास में चीन को पछाड़ना है तो भारतीय बच्चों के ऊपर से अंग्रेजी का भार उठाकर उन्हें अपनी भाषा में ही ज्ञान उपलब्ध कराना होगा। अंग्रेजी सीखने में व्यर्थ जाने वाली उनकी ऊर्जा को सृजनात्मक कार्यों में लगाना होगा ताकि देश के विकास में उनकी अधिक भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
भारतीय भाषाओं के मध्य उत्पन्न वैमनस्य को दूर करके आपसी सहयोग बढ़ाना होगा। भारतेन्दु हरिश्चंद्र की एक पंक्ति विकास के सारे मार्ग खोल देती है...
"निज भाषा उन्नति अहे सब उन्नति का मूल"
यही हमारा मूलमंत्र होगा तो भारतीय जो कि विश्व में सबसे अधिक बुद्धिमान होते है,अपने आपको भटकता हुआ नही पाएंगे।जब सारे अवसर उनकी अपनी भाषा में उपलब्ध होंगे तो उनकी समझ में कई गुना वृद्धि होगी जो देश की उन्नति के लिए अत्यंत लाभकारी होगी।
अतः 14 सितम्बर यदि मनाना ही है तो या तो भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाए या अंग्रेजी निषेध दिवस के रूप में मनाए।
सुझाव आमन्त्रित ।

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