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बिजली, फिल्म और शौचालय


बिजली की आँख मिचौली में,
रविवार की फिल्म का,
किरकिरा होता मजा;
किन्तु शोंक का करें क्या??
दो ही शोंक थे बालपन के,
खेलना, बेसब्री से रविवार की बाट जोहना;
शनिवार की साप्ताहिकी के बाद,
रविवार की हिन्दी फ़ीचर फिल्म के लिए,
फूलों सजी राहों में पलके बिछाना;
किन्तु बिजली????
फिल्म का पहला गीत आया नही कि गुल;
दौड़ते खेल के मैदान की और,
मन्द मन्द परिहास से मुँह चिढ़ाता चाँद,
कि अचानक जलते बल्ब,
और गाँव में उठता बच्चों का सुख क्रन्दन;
पाँव धरा को न छूते,
सब की दौड़ की एक ही मंजिल,
वह घर जहाँ शादी में आया था नया टी वी;
बिजली आने पर फिल्म का कोई भाग छूट न जाये;
उधर मार्ग में कतारबद्ध बैठी महिलाएँ,
एक पल के लिए खड़ी होती मुँह फिराकर,
कि अस्मत न जाये बह ,
चाँद के मन्दम आलोक की नदी में,
नाक को नाहक मिलती सजा की कहाँ थी फ़िक्र?
मन तो फिल्म की कथा पर होता,
खलनायक की पिटाई पर;
तब सचमुच बच्चे थे ,
हाँ बच्चे ही;
शुलभ शौचालय की खोज तो हो चुकी थी;
किन्तु जाग्रति न थी।
घर में शौचालय सुलभ कराने से,
मार्ग के किनारे विकल्प सुलभ था,
किन्तु चाँद का मन्दम परिहास,
हम पर नही था लक्षित,
इन महिलाओं पर था ;
आज बिजली गुल हुई और चाँद पर दृष्टि गड़ी,
तो बात समझ आयी ।।

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