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गुरु पूर्णिमा और शिक्षक दिवस


5 सितंबर के दिन पूरे देश में शिक्षक दिवस की बधाइयाँ गूँज रही थी। सारा सोशल मीडिया डॉ. राधाकृष्णन जी के फोटो और संदेशों से भरा हुआ था। प्रत्येक देशवासी गर्व के क्षणों में गोता लगा रहा था। डॉ.राधाकृष्णन जी के विचारों को जहाँ-तहाँ तरह तरह से उल्लेख किया जा रहा था।
डा. राधाकृष्णन माँ भारती के महान सपूतो में से एक हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति और दर्शन को उस दौर में विश्व के लोगों तक पहुँचाया जब हिन्दू स्वयं को हिन्दू बताने में शर्म का अनुभव किया करता था। हिन्दू 1000 वर्षों की दासता के बोझ तले इतना दब चुका था कि उस मानसिकता से निकलने की चाहत ही पूर्णतः खो चुकी थी। ऐसे में हिन्दू समाज की अवैदिक रूढ़ियों के विरुद्ध देश में ऋषि दयानन्द और राजा राम मोहन राय जैसे महापुरुषों ने संग्राम छेड़ दिया तो वेदों की सच्चाइयों को विवेकानन्द जी और राधाकृष्ण जी के द्वारा आंग्लभाषा में दूर देशों तक पहुँचाया। इसलिए अन्य महापुरुषों के संग डॉ. राधाकृष्णन आदरणीय है किन्तु उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने के ओचित्य पर संशय है।
क्या उनसे पहले भारतीय इतिहास में शिक्षक नही हुए ? परशुराम, गुरु द्रोण , गुरु बृहस्पति, गुरु वशिष्ठ, गुरु संदीपन, आचार्य शंकर, आचार्य रामानुज आदि सहस्रों महान शिक्षकों से भारतभूमि भरी पड़ी है जिनके शिष्यों में इतिहास बदलने की ताकत थी। ये नाम तो बानगी भर हैं। शायद यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने उनमें से किसी एक के जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में पर्व का रूप नही दिया बल्कि आषाढ़ की पूर्णिमा को सभी गुरुओं को समर्पित करते हुए महान पर्व बना दिया ।
कहते है डॉ. राधाकृष्णन ने स्वयं कहा था कि यदि उनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाये तो वें स्वयं को गौरान्वित महसूस करेंगे। क्या केवल उन्हें गौरान्वित करने के लिए हमने यह परम्परा बनायी? क्या विश्वगुरु भारत में ऐसा कोई दिवस 1962 से पूर्व नही था? और सबसे बड़ा प्रश्न यह कि भारतीय संस्कृति और दर्शन के इतने बड़े विद्वान क्या गुरुपूर्णिमा जैसे पर्व से अनभिज्ञ थे?
भारतीय पद्धति में शिक्षक अर्थात गुरु का स्थान माता पिता के बाद तीसरा आता है जो पूजनीय है। जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पुछा कि उनका परिचय क्या है तो अर्जुन ने गुरु द्रोण के विरुद्ध युद्धक्षेत्र में भी उत्तर दिया कि वह द्रोण शिष्य अर्जुन है।अर्थात हमारी संस्कृति में गुरुपद इतना उच्च है कि गुरु हमारी पहचान है। 33 कोटि देवताओं में माता पिता के उपरांत शिक्षक तीसरे देवता हैं और गुरुवंदन के लिए हमारी पर्वभूमि भारतवर्ष में एक बहुत बड़ा पर्व है गुरुपूर्णिमा। डॉ. राधाकृष्णन इसकी उपेक्षा करके अपने जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की अनुमति कैसे दे सकते हैं? आखिर एक देश में दो-दो शिक्षक दिवस के आयोजनों का क्या औचित्य है?
मुझ निर्बुद्धि के तो यह बात गले नही उतर रही है क्या पाठक लोग इसका समाधान दे सकते है?

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