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अक्टूबर, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

रूद्र के स्वरूप की पड़ताल

भगवान शिव का रूद्र नामक भयंकर रूप क्यों है? क्यों उनका रँग काला है? उनके पाँच मुख कौन कौन और कैसे है?उनकी दस भुजाओं का रहस्य क्या है? उनके तीन नेत्र कौन कौन से है? और उनके त्रिशूल का क्या अर्थ है? प्रतीकों में रमण करने वाले हिन्दुओं!क्या कभी इन प्रश्नों पर विचार किया है? तथाकथित पढ़े-लिखे लोग इस मूर्तियों को देखकर हँसते है। उनके हँसने का कारण भगवान शिव का वह स्वरूप ही नही है अपितु हमारे द्वारा उस स्वरूप को भगवान मान लेना है। हम उस प्रतीक में ही खुश है। उस मूर्ति के मुँह में लड्डू ठूँसकर भगवान की पूजा करके सन्तुष्ट हैं। न तो हम भगवान को जानने का प्रयास करते हैं और न हँसने वाले मूर्खों की जिज्ञासा शान्त कर सकते है। यही कारण है कि अपने धर्म से अनभिज्ञ हिन्दू धर्म से ही पलायन कर रहे हैं। दूसरे धर्म में व्याप्त पर्याप्त वासना उन्हें आकर्षित कर रही है। अतः विद्वपुरुषों ! अपने धर्म के मर्म को समझो और अन्य को भी समझाओ। हमने इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आपसे अनुरोध है कि उसको प्रचारित करें। उपनिषदों के एक एक श्लोक को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम u tube पर भी हैं और इस ब्लॉग पर तो ह...

चित्त का निरोध क्यों?

योग दर्शन के प्रारंभ में दूसरा सूत्र स्पष्ट घोषणा करता है की "योगस्य चित्तवृत्ति निरोध" अर्थात योग से चित्त में उत्पन्न होने वाली या चित्त की वृत्तियों की रोकथाम होती है। क्यों मनुष्य चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए इतना कठिन परिश्रम करता है? आखिर इन वृत्तियों में क्या है जो मनुष्य को इनसे दूर जाने के लिए प्रेरित करता है? महर्षि श्री वशिष्ठ जी अद्वैत के प्रतिपादक योग-वशिष्ठ के निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध में इन प्रश्नों को कुछ इस प्रकार हल करते हैं--- सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा को सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न होती है।तदन्तर पूर्वकाल की जगतवासनाओं का जगद्रूप में उद्भव होता है।इसलिए वासना की शांति को निर्वाण समझना चाहिए और वासना की सत्ता को ही संसाररूपी भ्रम समझना चाहिए।चित्त की वृत्ति को जगाकर बहिर्मुख कर देने से बन्धन होता है और उसे परमात्मा में लीन क्र देने पर निर्वाण प्राप्त होता है।चित्तवृत्ति का जागरण ही संसार रूपी शिशु को उत्पन्न करने वाला गर्भाशय है।उससे उत्पन्न हुआ यह जगत असत होते हुए भी सत के समान भासित होता है।चित्त के संकल्प का जाग्रत होना ही बन्धन बताया गया ...

दिव्य दृष्टि मुझमें है

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के विराटरूप से शायद ही कोई हिन्दू अपरिचित हो!किन्तु जो दिव्यदृष्टि उस समय अर्जुन और संजय को प्राप्त थी क्या वह अब भी किसी को प्राप्त हो सकती है? अधिकतर लोग कदाचित ना में ही उत्तर दें क्योंकि आज का सनातनी हिन्दू अपने वास्तविक धर्म से बहुत दूर है।धन कमाने और बढ़ाने की होड़ में धर्म के विषय में सदैव दूसरों का बिना सोचे समझे अनुसरण कर रहा है। कोई धर्म की कैसी भी व्याख्या कर दे उसे आँख बंद करके मान लेते हैं। उन धन कमाने वाले अंधो का कोई भी चतुर व्यक्ति लाभ उठा लेता है और भगवान के नाम पर लूटने लगता है। लोग प्रसन्नतापूर्वक लुट कर आते हैं और लूटने वाले को भगवान बना देते हैं। ईश्वर को समझने जाने का उनका उद्देश्य तो अच्छा होता है किंतु इस खोज में व्यक्तिपूजा में संलग्न हो जाते हैं । ऐसे लोगों को ईशोपनिषद ने "अंधम तमः प्रविशन्ति" कहा है अर्थात अज्ञान के अंधे कुएं में प्रवेश करने वाले। हमारा धर्म समृद्ध साहित्य से भरपूर है। इस साहित्य का अध्ययन मनन और निदिध्यासन करके अपने जीवन में आलोक भरना ही ईश्वर पूजा है। जो ईश्वर विराट है उसे एक तुच्छ मानव चोला ध...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...

दुर्गा भाभी

आज हमें हमारा अहं यह स्वीकारने ही नही देता कि जो आज हम हैं उसमें हमारा ही योगदान नही है अपितु लाखों करोड़ों पूर्वजों का भी सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार का योगदान जुड़ा है। हम 'मैं' में तो परिवर्तित हो ही नही सकता। जब जब ऐसा करने का प्रयत्न हुआ हमने अपने विनाश की ही नींव रखी। अहंकार रावण का रहा हो या कंस का, हिरण्यकश्यप का रहा हो या दुर्योधन का ; परिणाम विनाश में ही सामने आया है। क्या हम इस बात को नकार सकते है कि हमारे आज की स्थिति के अस्तित्व में हमारी स्वतन्त्रता की भी भूमिका है?क्या हमारे जीवन में स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों और वीरांगनाओं की कोई छवि नही है? सच तो यह है कि हम आज दुःखो के आतप से बचने के लिए जिस वटवृक्ष की शीतल छाया का उपभोग कर रहे है वह उन वीरों और वीरांगनाओ के तनों शाखाओं और पत्तियों से ही आच्छादित है। इस छाया का आनन्द लेते समय हमें उस आतप का सदा स्मरण रखना चाहिए जो हमारे लिए हमारे पूर्वजों ने हमें सुख देने के स्वप्न देखते हुए स्वयं के ऊपर सही ।वह दर्द हमारे लिए सहा गया इसलिए उस दर्द पर हमारा भी कुछ तो अधिकार है। उनके...

वाल्मीकिजी डाकू थे?

वो रत्नाकर थे या नही, आस्था की बात है किन्तु उन्होंने हमें रामायण जैसा महान ग्रन्थ रुपी रत्न प्रदान कर रत्नाकर अवश्य बना दिया। रामायण मात्र कथा नही है अपितु मर्यादा, कर्तव्य, निष्ठा, आस्था और प्रेम आदि का प्रतिमान है। इन शब्दों को अर्थ प्रदान करने वाले महान और आदि कवि महाऋषि वाल्मीकि को सतत एवं कोटि कोटि वन्दन। हमारे देश में विरोधियों को भी सम्मान देने की महान परम्परा है जिसका लाभ प्रायः ऐसे लोग उठाते हैं और हमारा भोलापन देखिये कि हम उनकी बातों को सत्य भी मान बैठते है। हो सकता है इसका कारण हजारों वर्षों की दासता हो जो जी हुजूरी की परंपरा में हमारे रक्त में शामिल हो गई है।जिसने जैसा कहा हमने सर झुका कर मान लिया। और अपनी पीढ़ियों को अपनी दासता की विवशता न बता पाने के कारण उस झूठ की मान्यता को सत्य दिखाने के प्रयत्न में तरह तरह की कहानियाँ गढ़ ली। क्योंकि हमारी साहित्यिक परम्परा में पात्रों के नाम भी उनके चरित्र से मेल खाते हैं। हम दुर्योधन व दुशासन को सुयोधन व सुशासन नाम से नही जानते।फिर रत्नाकर को डाकू कैसे कहा जा सकता है। आज हिन्दू धर्म पर शोध की नही अपितु शोधों की आवश्यकता है ताकि सभी...