सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

दिव्य दृष्टि मुझमें है


श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के विराटरूप से शायद ही कोई हिन्दू अपरिचित हो!किन्तु जो दिव्यदृष्टि उस समय अर्जुन और संजय को प्राप्त थी क्या वह अब भी किसी को प्राप्त हो सकती है?
अधिकतर लोग कदाचित ना में ही उत्तर दें क्योंकि आज का सनातनी हिन्दू अपने वास्तविक धर्म से बहुत दूर है।धन कमाने और बढ़ाने की होड़ में धर्म के विषय में सदैव दूसरों का बिना सोचे समझे अनुसरण कर रहा है। कोई धर्म की कैसी भी व्याख्या कर दे उसे आँख बंद करके मान लेते हैं। उन धन कमाने वाले अंधो का कोई भी चतुर व्यक्ति लाभ उठा लेता है और भगवान के नाम पर लूटने लगता है। लोग प्रसन्नतापूर्वक लुट कर आते हैं और लूटने वाले को भगवान बना देते हैं। ईश्वर को समझने जाने का उनका उद्देश्य तो अच्छा होता है किंतु इस खोज में व्यक्तिपूजा में संलग्न हो जाते हैं । ऐसे लोगों को ईशोपनिषद ने "अंधम तमः प्रविशन्ति" कहा है अर्थात अज्ञान के अंधे कुएं में प्रवेश करने वाले।
हमारा धर्म समृद्ध साहित्य से भरपूर है। इस साहित्य का अध्ययन मनन और निदिध्यासन करके अपने जीवन में आलोक भरना ही ईश्वर पूजा है। जो ईश्वर विराट है उसे एक तुच्छ मानव चोला धारण करने की आवश्यकता नही है। श्रीकृष्ण महायोगी एवं महाज्ञानी थे वे जानते थे कि समस्त सृष्टि उस विराट का प्रस्फुटन ही है। वह सृष्टि का जो आत्मा है वही मेरा भी आत्मा है अतः मैं वही हूँ। किन्तु इस ज्ञान को अर्जन करने वाला अर्जुन यह नही जानता था इसलिए श्री कृष्ण ने यथोपदेश द्वारा उसके ज्ञानचक्षु खोले और उसे सत्यदर्शन कराया । उन्होंने अर्जुन को समझाया कि विराटरूप धारी विधाता समष्टि मन रूप होने के कारण स्वयं ही मन है,अतः इसके लिए दुसरे मन की आवश्यकता नही है। यही नही, ये विराट पुरुष स्वयं ही इंद्रियां है,अतः इन्हें दूसरी इंद्रियों के उपभोग की आवश्यकता नही है। उस ईश्वर ने ही तो अन्य सब शरीरों में इंद्रियों की रचना की है। संसार के जो भी कार्य हैं वें सब के सब उस विराट पुरुष के ही है।क्योंकि ब्रह्म के संकल्प ही विभिन्न व्यष्टि वृत्ति से अपने में भेद का आरोप करके जगत व्यवहार के रूप में चल रहे हैं। उसी की सत्ता से अनन्त आकार के विश्व की सत्ता है और उसके संकल्प के उपसंहार से ही विश्व का संहार है।वायु और उसकी चेष्टा में जैसी एकता है वैसी ही एकता या एकसत्ता ब्रह्म और विश्व की भी है। यही बात वशिष्ठ जी ने राम को भी समझाई थी।
हमें राम और कृष्ण बनना है ; उनकी पूजा में ही जीवन व्यर्थ नही गवांना है। हमें शुद्ध आचरण और मर्यादा का प्रचार अपने जीवन से करना है; ईश्वर को जानना है, मानना नही।
"दिव्य दृष्टि तो मुझमें है उसका प्रयोग करना मुझे आना चाहिए और इसके लिए मैं अपने शास्त्रों का अध्ययन करूँगा, उन पर मनन करूँगा और उनके अनुसार आचरण करूँगा।"आओ इस संकल्प के साथ दिव्यज्ञान की खोज में जुट जाएं। थोड़ा समय तो दीजिये अपने धर्म के मर्म को जानने के लिए।।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...