अधिकतर लोग कदाचित ना में ही उत्तर दें क्योंकि आज का सनातनी हिन्दू अपने वास्तविक धर्म से बहुत दूर है।धन कमाने और बढ़ाने की होड़ में धर्म के विषय में सदैव दूसरों का बिना सोचे समझे अनुसरण कर रहा है। कोई धर्म की कैसी भी व्याख्या कर दे उसे आँख बंद करके मान लेते हैं। उन धन कमाने वाले अंधो का कोई भी चतुर व्यक्ति लाभ उठा लेता है और भगवान के नाम पर लूटने लगता है। लोग प्रसन्नतापूर्वक लुट कर आते हैं और लूटने वाले को भगवान बना देते हैं। ईश्वर को समझने जाने का उनका उद्देश्य तो अच्छा होता है किंतु इस खोज में व्यक्तिपूजा में संलग्न हो जाते हैं । ऐसे लोगों को ईशोपनिषद ने "अंधम तमः प्रविशन्ति" कहा है अर्थात अज्ञान के अंधे कुएं में प्रवेश करने वाले।
हमारा धर्म समृद्ध साहित्य से भरपूर है। इस साहित्य का अध्ययन मनन और निदिध्यासन करके अपने जीवन में आलोक भरना ही ईश्वर पूजा है। जो ईश्वर विराट है उसे एक तुच्छ मानव चोला धारण करने की आवश्यकता नही है। श्रीकृष्ण महायोगी एवं महाज्ञानी थे वे जानते थे कि समस्त सृष्टि उस विराट का प्रस्फुटन ही है। वह सृष्टि का जो आत्मा है वही मेरा भी आत्मा है अतः मैं वही हूँ। किन्तु इस ज्ञान को अर्जन करने वाला अर्जुन यह नही जानता था इसलिए श्री कृष्ण ने यथोपदेश द्वारा उसके ज्ञानचक्षु खोले और उसे सत्यदर्शन कराया । उन्होंने अर्जुन को समझाया कि विराटरूप धारी विधाता समष्टि मन रूप होने के कारण स्वयं ही मन है,अतः इसके लिए दुसरे मन की आवश्यकता नही है। यही नही, ये विराट पुरुष स्वयं ही इंद्रियां है,अतः इन्हें दूसरी इंद्रियों के उपभोग की आवश्यकता नही है। उस ईश्वर ने ही तो अन्य सब शरीरों में इंद्रियों की रचना की है। संसार के जो भी कार्य हैं वें सब के सब उस विराट पुरुष के ही है।क्योंकि ब्रह्म के संकल्प ही विभिन्न व्यष्टि वृत्ति से अपने में भेद का आरोप करके जगत व्यवहार के रूप में चल रहे हैं। उसी की सत्ता से अनन्त आकार के विश्व की सत्ता है और उसके संकल्प के उपसंहार से ही विश्व का संहार है।वायु और उसकी चेष्टा में जैसी एकता है वैसी ही एकता या एकसत्ता ब्रह्म और विश्व की भी है। यही बात वशिष्ठ जी ने राम को भी समझाई थी।
हमें राम और कृष्ण बनना है ; उनकी पूजा में ही जीवन व्यर्थ नही गवांना है। हमें शुद्ध आचरण और मर्यादा का प्रचार अपने जीवन से करना है; ईश्वर को जानना है, मानना नही।
"दिव्य दृष्टि तो मुझमें है उसका प्रयोग करना मुझे आना चाहिए और इसके लिए मैं अपने शास्त्रों का अध्ययन करूँगा, उन पर मनन करूँगा और उनके अनुसार आचरण करूँगा।"आओ इस संकल्प के साथ दिव्यज्ञान की खोज में जुट जाएं। थोड़ा समय तो दीजिये अपने धर्म के मर्म को जानने के लिए।।
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