क्यों मनुष्य चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए इतना कठिन परिश्रम करता है? आखिर इन वृत्तियों में क्या है जो मनुष्य को इनसे दूर जाने के लिए प्रेरित करता है?
महर्षि श्री वशिष्ठ जी अद्वैत के प्रतिपादक योग-वशिष्ठ के निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध में इन प्रश्नों को कुछ इस प्रकार हल करते हैं---
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा को सृष्टि रचने की इच्छा उत्पन्न होती है।तदन्तर पूर्वकाल की जगतवासनाओं का जगद्रूप में उद्भव होता है।इसलिए वासना की शांति को निर्वाण समझना चाहिए और वासना की सत्ता को ही संसाररूपी भ्रम समझना चाहिए।चित्त की वृत्ति को जगाकर बहिर्मुख कर देने से बन्धन होता है और उसे परमात्मा में लीन क्र देने पर निर्वाण प्राप्त होता है।चित्तवृत्ति का जागरण ही संसार रूपी शिशु को उत्पन्न करने वाला गर्भाशय है।उससे उत्पन्न हुआ यह जगत असत होते हुए भी सत के समान भासित होता है।चित्त के संकल्प का जाग्रत होना ही बन्धन बताया गया है और उसे सुलाकर--आत्मा में लीन करके अपने चैतन्य-स्वरूप का अनुभव करना ही मोक्ष कहा गया है।
साधक को
बन्ध, मोक्ष आदि की सारी शंकाएँ छोड़कर निर्वाणरूप, वासनाशून्य, अनन्त, अनादि, विशुद्ध, केवल बोधस्वरूप, द्वैताद्वैत से रहित,परिपूर्ण ब्रह्मस्वरूप हुए आकाश के समान विशद अंतःकरण से युक्त, बन्धनमुक्त तथा शान्तभाव में स्थित रहना चाहिए।
यह स्थिति पाने के लिए योग एक सशक्त मार्ग है।अतः सनातनी हिन्दूओं और धर्मप्रेमियों ! योग को मात्र कसरत के रूप में नही अपितु वृहत्त रूप में अपनाओ और स्वयं के व ईश्वर के सम्बन्ध को पहचानो।
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