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वाल्मीकिजी डाकू थे?


वो रत्नाकर थे या नही, आस्था की बात है किन्तु उन्होंने हमें रामायण जैसा महान ग्रन्थ रुपी रत्न प्रदान कर रत्नाकर अवश्य बना दिया। रामायण मात्र कथा नही है अपितु मर्यादा, कर्तव्य, निष्ठा, आस्था और प्रेम आदि का प्रतिमान है। इन शब्दों को अर्थ प्रदान करने वाले महान और आदि कवि महाऋषि वाल्मीकि को सतत एवं कोटि कोटि वन्दन।
हमारे देश में विरोधियों को भी सम्मान देने की महान परम्परा है जिसका लाभ प्रायः ऐसे लोग उठाते हैं और हमारा भोलापन देखिये कि हम उनकी बातों को सत्य भी मान बैठते है। हो सकता है इसका कारण हजारों वर्षों की दासता हो जो जी हुजूरी की परंपरा में हमारे रक्त में शामिल हो गई है।जिसने जैसा कहा हमने सर झुका कर मान लिया। और अपनी पीढ़ियों को अपनी दासता की विवशता न बता पाने के कारण उस झूठ की मान्यता को सत्य दिखाने के प्रयत्न में तरह तरह की कहानियाँ गढ़ ली। क्योंकि हमारी साहित्यिक परम्परा में पात्रों के नाम भी उनके चरित्र से मेल खाते हैं। हम दुर्योधन व दुशासन को सुयोधन व सुशासन नाम से नही जानते।फिर रत्नाकर को डाकू कैसे कहा जा सकता है। आज हिन्दू धर्म पर शोध की नही अपितु शोधों की आवश्यकता है ताकि सभी सत्य यथार्थ रूप में हमारे सम्मुख आ सके।
अग्नि शर्मा नाम का व्यक्ति डाकू डाकू और हत्यारा बनकर रत्नाकर कैसे बन सकता है? सन्त परम्परा के पोषक और ज्ञान व धर्म के धनी भृगु वंश में जन्म लेने वाला बालक डाकू कैसे बन सकता है?
ऋषि प्रचेता की सन्तान में अवगुण कैसे घर कर सकते है? और सबसे बड़ी बात कि डाकू प्रवृति का व्यक्ति महृषि कैसे बन सकता है। वाल्मीकि जी ये सब बने और थे। अर्थात कोई भी तर्क उनके डाकू होने की पुष्टि नही करते।
जो व्यक्ति एक प्रेममग्न पक्षी के जोड़े की मृत्यु पर मर्माहत हो जाये क्या वह कभी हत्यारा रहा होगा? कदापि नही। जिसके हृदय से अचानक काव्यधारा फूट पड़ी हो वह दुश्चरित्र कदापि नही हो सकता।
मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥'
ऐसा श्लोक यदि प्रथम श्लोक है तो आप सोच सकते है कि उस व्यक्तित्व के अंदर कितना बड़ा साहित्यकार छिपा है। उनके शिष्य महृषि भारद्वाज द्वारा सँजोया गया यह अकेला श्लोक वाल्मीकि जी के महान साहित्यकला का द्योतक है।
कुछ पाश्चात्य विद्वान महृषि जी को 500 BC से 100 BC के मध्य में होने का दावा करते हैं तथा रामायण को महाभारत का समकालीन ग्रन्थ मानते हैं। उनकी दुर्बुद्धि पर तरस आता है। क्योंकि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम स्वयं महृषि जी के आश्रम की शोभा बने थे। चलो इस बात को नकार भी दिया जाये किन्तु उत्तर रामायण तो महृषि वाल्मीकि के आश्रम में ही पूर्ण होती है और सबसे पहले रामायण को काव्य संस्करण को याद ही श्रीराम के पुत्र लव और कुश करते है।
कुछ लोगों को महान व्यक्तियों को ईश्वर से लिंक करने का ऐसा शोंक चढ़ता है कि उनके पूर्वजन्म या जन्मपूर्व झाँकने में समय ही नही लगाते। कहा जाता है कि वाल्मीकि जी ब्रह्मा जी के अवतार है जो त्रेता में वाल्मीकि बन कर और कलियुग में तुलसी बनकर धरती पर आये। अरे भाई! ईश्वर को धरती पर आने की आवश्यकता क्या है। क्या वेद अपौरूषेय नही है? यदि है तो बार बार ईश्वर को मानव के रूप में बाँधने की क्या आवश्यकता है?
महृषि वाल्मीकि एक महान व्यक्ति थे। उनके जीवन का एक एक पल प्रेरणादायी है और हमे उनसे प्रेरणा लेकर अपने जीवन को उसी ज्योति में तपाने को तत्पर रहना चाहिए जिसमें तप कर वाल्मीकि जी महान बने।
महृषिजी के जन्मदिन की शुभकामनाएं।
कुछ गलत लगे तो इस अल्पज्ञ का मार्गदर्शन करें ।

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