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दुर्गा भाभी


आज हमें हमारा अहं यह स्वीकारने ही नही देता कि जो आज हम हैं उसमें हमारा ही योगदान नही है अपितु लाखों करोड़ों पूर्वजों का भी सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार का योगदान जुड़ा है। हम 'मैं' में तो परिवर्तित हो ही नही सकता। जब जब ऐसा करने का प्रयत्न हुआ हमने अपने विनाश की ही नींव रखी। अहंकार रावण का रहा हो या कंस का, हिरण्यकश्यप का रहा हो या दुर्योधन का ; परिणाम विनाश में ही सामने आया है।
क्या हम इस बात को नकार सकते है कि हमारे आज की स्थिति के अस्तित्व में हमारी स्वतन्त्रता की भी भूमिका है?क्या हमारे जीवन में स्वतंत्रता की बलि वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीरों और वीरांगनाओं की कोई छवि नही है?
सच तो यह है कि हम आज दुःखो के आतप से बचने के लिए जिस वटवृक्ष की शीतल छाया का उपभोग कर रहे है वह उन वीरों और वीरांगनाओ के तनों शाखाओं और पत्तियों से ही आच्छादित है। इस छाया का आनन्द लेते समय हमें उस आतप का सदा स्मरण रखना चाहिए जो हमारे लिए हमारे पूर्वजों ने हमें सुख देने के स्वप्न देखते हुए स्वयं के ऊपर सही ।वह दर्द हमारे लिए सहा गया इसलिए उस दर्द पर हमारा भी कुछ तो अधिकार है। उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का कोई भी अवसर हमें छोड़ना नही चाहिए।
आज मैं कृतज्ञता प्रकट करता हूँ 7 अक्टूबर 1907 को जन्मी एक ऐसी महिला को जिसको आजाद भारत ने प्रायः भुला ही दिया। महान क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की धर्मपत्नी और भगत सिंह , चन्द्र शेखर, राजगुरु, सुखदेव आदि क्रांतिकारियों को भाभी माँ का प्यार और दुलार देने वाली दुर्गा भाभी ।क्रांति का छुपा चेहरा रही दुर्गा भाभी , जिसने अपने सामने ही अपने पति व भारत के महान सपूतों को बलि वेदी पर चढ़ते देखा और आजाद भारत मे नेहरूजी की सहायता की पेशकश को विनम्रता से ठुकराकर गरीबी में अपना जीवन बिता दिया किन्तु स्वाभिमान कभी न त्यागा।1999 में इस वीरांगना ने अंतिम सांस ली । आज उनके जन्मदिन के शुभावसर पर उस देवी को शत शत नमन।।

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