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वस्त्र और वैराग्य


भारत में वेदों पर आस्था रखने वाले आस्तिक दार्शनिक विचारधाराएं हों या जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसी नास्तिक विचारधाराएं हो;सभी में जीवन के साथ साथ मृत्यु और मृत्यु के उपरांत, दोनों स्थितियों को अपने अपने चश्मे से देखा है तथा मानव का परमशुभ जीवन से परे मृत्यु के उपरांत ही खोजा है।किन्तु उस परमशुभ तक पहुँचने के लिए प्रयत्न सभी जीवन में ही करने है।
सबसे पहला प्रयत्न है मन का अनासक्त होना और जीवन में वैराग्य होना। किन्तु वैराग्य को सनातनी महापुरुषों ने कर्तव्य के साथ जोड़ा है और नास्तिक दर्शनकारों ने कर्तव्यच्युत होने को ही वैराग्य समझा है। शायद यही कारण है कि सनातनी राजा हरिश्चंद्र हो, जनक हो, राम हो या महायोगी श्रीकृष्ण हो; ये लोग अपने सनातनी कर्तव्यों से कभी नही भागे अपितु गृहस्थ होते हुए भी सन्यासी का जीवन जिया । किन्तु बुद्ध और महावीर ने वैराग्य मि ज्वाला मन में जलते ही सर्वप्रथम गृहत्याग किया । सम्भवतः सुपात्र व्यक्तियों को योग्य गुरु न मिलने के कारण ऐसा हुआ। वेदों से दूरी भी इनके भटकाव का कारण बनी।
किन्तु कहते है कि लक्ष्य वही पता है जो घर से निकलता है। घर में पड़े हुए व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्ति नही होती। बुद्ध और महावीर भी अपने अंदर मचे अन्तर्द्वन्द पर विजय पाने में सफल हुए और विश्व को महान दर्शन दिए। किन्तु वैराग्य की सीमा का अतिक्रमण करके उन्हें यह सफलता प्राप्त हुई। महावीर तो वैराग्य की पराकाष्ठा तक जा पहुँचे। वस्त्र तक से उन्हें वैराग्य हो गया। हो सकता है वह निर्वस्त्र होकर संकेत देना चाहते हों कि जिस प्रकार भौतिक होने के कारण उन्होंने वस्त्र तक त्याग दिए उसी प्रकार मुमुक्षु लोग सभी भौतिक वस्तुओं और वासनाओं का त्याग करें। सन्देश बुरा नही किन्तु मर्यादा का पालन करते हुए त्याग हो तो अधिक श्रेयकर है। सम्भवतः उनके अगली पीढ़ी के मनीषी इसीलिए विचारशक्ति का विकास करते हुए दिगम्बर से श्वेताम्बर हुए।

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