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धर्म का अध्ययन क्यों ?


बाबा रामदेव की सभा लगी थी। उसमें एक MBBS किये हुए डॉक्टर बैठे थे। अतीत में बाबा के कटु आलोचक थे। समझदार थे। उन्होंने निश्चय किया कि योग और आयुर्वेद की आलोचना के लिए पहले उनके बारे में जाने और प्रयोग करें। अतः एक रोज वें बाबा के योग शिविर में जा पहुँचे। योग सीखा और अपनी प्रैक्टिस में आने वाले मरीजों को भी कुछ आसान के लिए प्रेरित करने लगे। योग के सकारात्मक परिणाम ने उनकी मनोदशा को भी बदलकर रख दिया और अब वें योगशिक्षक के रूप में निशुल्क सेवा कर रहे हैं।
कुछ ऐसा ही होता है उन लोगों के साथ भी; जो हिन्दू धर्म की आलोचना करने के लिए वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगते है और सत्मार्ग को पहचान कर उस पर चलकर अपना उद्धार कर लेते हैं। कुछ लोग भोग के वश में होकर भोग सामग्रियों के लिए ही शास्त्र के अभ्यास में लग जाते है और परम् पद प्राप्त कर लेते हैं।शास्त्रों में निपुण योग्य गुरु का निरन्तर श्रवण या शास्त्रों का नियमित अध्ययन मनुष्य को सच में मनुष्य बना देते हैं। इसलिए आजकल के पढ़ेलिखे समाज में मनुष्य को चाहिए कि धूर्त के व्यख्यान सुनने की अपेक्षा स्वयं अपने धर्मग्रन्थों यथा भागवत गीता, रामायण, उपनिषद, वेद, योगवशिष्ठ आदि आदि ग्रन्थों के साथ साथ छः दर्शनों का यथासम्भव अध्ययन करें और स्वयं के साथ साथ प्रकृति और ईश्वर से अपने सम्बन्धों को समझें।
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सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...

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