कुछ ऐसा ही होता है उन लोगों के साथ भी; जो हिन्दू धर्म की आलोचना करने के लिए वेदों और उपनिषदों का अध्ययन करने लगते है और सत्मार्ग को पहचान कर उस पर चलकर अपना उद्धार कर लेते हैं। कुछ लोग भोग के वश में होकर भोग सामग्रियों के लिए ही शास्त्र के अभ्यास में लग जाते है और परम् पद प्राप्त कर लेते हैं।शास्त्रों में निपुण योग्य गुरु का निरन्तर श्रवण या शास्त्रों का नियमित अध्ययन मनुष्य को सच में मनुष्य बना देते हैं। इसलिए आजकल के पढ़ेलिखे समाज में मनुष्य को चाहिए कि धूर्त के व्यख्यान सुनने की अपेक्षा स्वयं अपने धर्मग्रन्थों यथा भागवत गीता, रामायण, उपनिषद, वेद, योगवशिष्ठ आदि आदि ग्रन्थों के साथ साथ छः दर्शनों का यथासम्भव अध्ययन करें और स्वयं के साथ साथ प्रकृति और ईश्वर से अपने सम्बन्धों को समझें।
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