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नदी में फेन नही ,वृद्धावस्था के श्वेतकेश



सुबह सुबह ऋषिकेश की पावन भूमि पर पग धर चुके थे। अब भौंर का मन्द प्रकाश जैसे जैसे लालिमा लेता जा रहा था, हमारे डग गंगा घाट की और अग्रसर थे और निन्दियायी आँखों में गंगा की ताजगी के दर्शन की अभिलाषा आँखों को फाड़े डाल रही थी। कुछ ही पलों के उपरान्त हम गंगा में डुबकी लगा रहे थे। गंगा का वेग गंगा की महानता के गीत सुनाता हुआ नृत्य कर रहा था और हम उन सुरों को अपने आक्षेप से बेसुरा कर रहे थे। गंगा माँ से यह सहन न हुआ तो अपनी शीतलता हम पर उड़ेल दी और हम काँपते हुए किनारे पर आ बैठे।गंगा की महानता को निहारते हुए विचारों की नदी उफान मारने लगी।
यदि देखा जाये तो यह जीवन भी एक नदी ही है। इसमें नाना प्रकार के विक्षेप बड़ी बड़ी लहरों के समान है। कालचक्र ही इनमें भँवरें बनकर उठता है। जन्म और मृत्यु ही इसके दो तट हैं तथा इसमें सुख-दुःख की छोटी छोटी तरंगें उठती रहती हैं। यौवन का उल्लास ही इसका कीचड़ है।वृद्धावस्था के श्वेत केश ही इसके धवल फेन हैं। व्यवहार ही इसके महाप्रवाह की रेखा है।इसमें नाना प्रकार के जड़रव(मूर्खों का कोलाहल)और जलरव( जल की ध्वनि ) हैं। राग-द्वेष रुपी बादल इसे बढ़ाते रहते हैं तथा भूतल पर इसका शरीर सदा ही चञ्चल रहता है।लोभ और मोह के महान आवर्त्त उसमें उठते रहते हैं।पात और उत्पात से इसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।इस प्रकार यह जीवन नामक नदी शब्दमात्र से तो अत्यन्त शीतल है;परन्तु वास्तव में त्रिविध तापों से अत्यन्त सन्तप्त रहा करती है। संसार रूपी नदी में जितने भी नाते रिश्तेदार हैं उनमें पहले पहले के तो चले जाते हैं और नये नये आते रहते हैं।यहाँ कुछ भी स्थिर नही है, जो पदार्थ प्राप्त है वें नष्ट हो जाते हैं। अतः इन क्षणभंगुर पदार्थों से कौन सा प्रयोजन सिद्ध होता है? जब प्राप्त हुई वस्तुओं की यह दशा है तब जो नये पदार्थ पैदा होते है उन पर भी यहाँ कैसे आस्था हो सकती है? संसार की जितनी नदियाँ हैं उन सबका जल उद्गमस्थल से आता है और सागर की और जाता है;परन्तु इस शरीररूपी नदी का जो आयुरूपी जल है,वह केवल जाता ही है,फिर न आने के लिए।।
"अरे चल भाई! सुन्दर पर्वतों की सुषमा भी देख ले" मित्र की वाणी में विचार नदी ऐसे विलीन हो गयी जैसे नदी रेगिस्तान में विलुप्त हो जाती है।

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