नवीन खोजों के लिए हम प्रायः पाश्चात्य विद्वानों का अनुसरण करके ही आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। अपने विद्वानों पर से तो जैसे विश्वास ही उठ गया है।यही प्रेरणा हम अगली पीढ़ी को दे रहें हैं। किसी विषय के मूल को पढ़ाते हुए भी हम अपने विद्यार्थियों को अपने विद्वानों और उनके अनुसन्धान के विषय में बताना पसन्द नही करते।क्या अपनों का अनादर करके विकसित होने पर हम सन्तुष्टि का अनुभव कर सकते है?
जीवविज्ञान में बचपन से हम जीवों के वर्गीकरण के विषय में पढ़ते थे। हमें कभी पता नही चला कि इस विषय में भारतीय मनीषियों का भी कोई योगदान है।आज भी आप विकिपीडिया उठाकर देख लीजिए किसी भारतीय का नाम उसमे नही मिलेगा । एक उदाहरण विकिपीडिया से नकल करके दे रहा हूँ--
ग्रीस के अनेक प्राचीन विद्वान, विशेषत: हिपॉक्रेटीज (Hippocrates, 46-377 ई. पू.) ने और डिमॉक्रिटस (Democritus, 465-370 ई. पू.), ने अपने अध्ययन में जंतुओं को स्थान दिया है। स्पष्ट रूप से अरस्तू (Aristotle, 384-322 ई. पू.) ने अपने समय के ज्ञान का उपयुक्त संकलन किया है। ऐरिस्टॉटल के उल्लेख में वर्गीकरण का प्रारंभ दिखाई पड़ता है। इनका मत है कि जंतु अपने रहन सहन के ढंग, स्वभाव और शारीरिक आकार के आधार पर पृथक् किए जा सकते हैं। इन्होंने पक्षी, मछली, ह्वेल, कीट आदि जंतुसमूहों का उल्लेख किया है और छोटे समूहों के लिए कोलियॉप्टेरा (Coleoptera) और डिप्टेरा (Diptera) आदि शब्दों का भी प्रयोग किया है। इस समय के वनस्पतिविद् अरस्तू की विचारधारा से आगे थे। उन्होंने स्थानीय पौधों का सफल वर्गीकरण कर रखा था।
इस ग्रीक उपलब्धि पर हम इतरा रहे हैं कि देखो ! 2000 साल पहले भी मानव ने वर्गीकरण कर लिया था।क्या हिपोक्रेट्स और अरस्तू मनु से भी प्राचीन हैं? क्या मनु को वर्गीकरण का श्रेय नही मिलना चाहिए। पाश्चात्य और मुस्लिम इतिहासकार तो भारतीय ज्ञान को प्राचीनता को स्वीकार करने से ही घबराते हैं;किन्तु क्या सनातनी हिन्दू भी अपने अतीत से अनभिज्ञ रहने का पाप कर सकता है?
मनु ने मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है--
पशवश्च मृगाश्चैव व्यालाश्चोभयतोद्तः।
रक्षांसि च पिशाचाश्च मनुष्याचाश्च जरायुजा।
दृष्टि चार प्रकार की है पशु, सिंह, ऊपर नीचे दाँत वाले, सब राक्षस , पिशाच और मनुष्य यें सब 'जरायुज' कहलाते हैं।
अण्डजा:पक्षिणः सर्पा नक्रा मत्स्याश्च कच्छपा:।
यानि चैवं प्रकाराणि स्थलजान्यौदकानि च।।
पक्षी, साँप, नाक मछली,कछुआ और जो ऐसे ही भूमि या जल में पैदा होने वाले जीव है,वें सब 'अण्डज' हैं।
स्वेदजं दंशमशकं यूकामक्षिकमत्कुणम।
दंश, मच्छर, जूँ, मक्खी, खटमल आदि स्वेदज है।
उद्भिज्ज स्थावरा:सर्वे बीजकांडप्ररोहिण:।
ओसधयः फलपाकान्ता
बहुपुष्प फलोपगा:।
वृक्ष आदि को उद्भिज्ज कहते है। ये दो तरह के हैं,बीज से पैदा होने वाले और शाखा से पैदा होने वाले। जो वृक्ष फलों के पक जाने पर सूख जाते हैं और जो बहुत फल फूल वाले होते हैं उनको औषधि कहते हैं।
यें तो उदाहरण मात्र हैं। अब आप सोचिये की जब हम बच्चों को अरस्तू के ज्ञान के बारे में बता रहे है तो मनु के बारे में क्यों नहीं? ऐसा ही ऋषि बोधायन के साथ भी हो रहा है जिनकी त्रिभुज प्रमेय को हम पाइथागोरस प्रमेय के रूप में पढ़ा रहे हैं। आखिर भारतीय मनीषियों के साथ यह भेदभाव कब तक चलता रहेगा।
भारत माँ के वीर सपूतों! केवल सेना में जाकर देश के लिए वीरगति प्राप्त करना ही देशसेवा नही है;अपितु देश के सम्मान और उसकी उपलब्धियों को विश्व के सम्मुख रखना भी देशसेवा है। अतः अपने मनीषियों के साथ होने वाले इस अन्याय के विरुद्ध खड़े होना देश के नवयुवाओं के लिए अत्यंत शोभायमान है।
अपनी संस्कृति और ज्ञान की खोज करो;तुम्हे स्वयं पर बहुत गर्व होगा।

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