प्रायः ईश्वर की बनाई इस दृष्टि को दुःख का पर्याय माना जाता है। दुःख का कारण है अज्ञान,और इस अज्ञान को दूर करने के विभिन्न मार्ग दर्शन या शास्त्र के नाम से विख्यात हैं। मुख्यतः दुःख के तीन प्रकार के माने गये हैं--
1)आधिभौतिक
2)आधिदैविक और
3)आधिदैहिक
आधिभौतिक दुःख उन्हें कहा जाता है जिनका कारण भौतिक अथवा प्राकृतिक हो। जैसे भीषण गर्मी या भयंकर ठण्ड पड़ना, अतिवृष्टि व बाढ़ में सब कुछ तबाह हो जाना, भूकम्प में सब प्रकार की सम्पत्ति का नष्ट हो जाना, सुनामी आना, बादल फटना आदि आदि। इन आपदाओं को दृढ़ मन से सहन ही करना पड़ता है इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही होता।
आधिदैविक दुःख में हमारे मन बुद्धि और अहंकार को चोट पहुँचती है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, आसक्ति,आशा, तृष्णा आदि इस दुःख के कारण है; और इन सब का मूल अज्ञान है।
तीसरा है आधिदैहिक दुःख; शरीर में चोट लगना, फोड़े फुंसी होना, ज्वर आना, एलर्जी होना अर्थात किसी भी प्रकार के शारीरिक रोग। आधिदैहिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए हम प्रायः किसी डॉक्टर ,वैध या हकीम के पास दौड़ते हैं।
अब प्रश्न यह है कि इन दुःखों के मूल कारण अज्ञान को क्या हम दूर करने का प्रयास कर रहे हैं?
"विकास" नामक राक्षस को उत्पन्न कर हम आधिभौतिक और दैहिक दुःखों को लगातार निमन्त्रण दे रहे है और मन में ईर्ष्या, अहंकार लालच और रोग भरकर स्वयं की बुद्धि और शरीर को नष्ट कर रहे हैं। प्रकृति ईश्वर-प्रदत्त सर्वगुण-सम्पन्न पूंजी है जो ईश्वर ने दयापूर्वक जीवों को जीवन जीने के लिए प्रदान की है, किन्तु प्रकृति का सबसे बुद्धिमान जीव मानव ने लालचवश अन्य जीवों का हक़ छीनकर केवल अपने लाभ के लिए इसका अन्यायपूर्ण तरीके से अतिदोहन कर डाला। इसी कारण दुःख विकास के साथ साथ कम होने की अपेक्षा दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे है। साधन जिस अनुपात में बढ़ रहे सुख उसी अनुपात में कम हो रहा है। तीनों में से कम से कम एक दुःख से तो छुटकारा मिलें!
हमारी सनातन परम्परा में एक शब्द 'योग' इन सभी दुःखों के हमे दूर करता है।
योग; मानव और प्रकृति में मध्य।
योग; मानव और ईश्वर के मध्य।
योग,प्रकृति और ईश्वर के मध्य।
तीनों प्रकार के योग में मानव मध्य में है और मानव ही यह योग बना सकता है। इस विश्व में ईश्वर के बाद यदि कोई उच्चतम शक्ति है तो वह मानव है। उसके अच्छे कर्म पूरी सृष्टि को लाभ देते है और बुरे कर्म पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकने में सक्षम है। अतः"विकास" द्वारा उत्पन्न बड़ी समस्या 'प्रदूषण' का हल सनातन जीवन पद्धति में ही प्राप्त होगा। इसके लिए पहले तेजी से हिन्दूओं को अपने स्वरूप को पहचान कर प्रकृति से समझौता करते हुए मर्यादित जीवन पद्धति को अपनाना होगा और फिर पूरे विश्व में योग के सभी स्वरूपों को पहुँचाना होगा।
ॐ
1)आधिभौतिक
2)आधिदैविक और
3)आधिदैहिक
आधिभौतिक दुःख उन्हें कहा जाता है जिनका कारण भौतिक अथवा प्राकृतिक हो। जैसे भीषण गर्मी या भयंकर ठण्ड पड़ना, अतिवृष्टि व बाढ़ में सब कुछ तबाह हो जाना, भूकम्प में सब प्रकार की सम्पत्ति का नष्ट हो जाना, सुनामी आना, बादल फटना आदि आदि। इन आपदाओं को दृढ़ मन से सहन ही करना पड़ता है इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही होता।
आधिदैविक दुःख में हमारे मन बुद्धि और अहंकार को चोट पहुँचती है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, आसक्ति,आशा, तृष्णा आदि इस दुःख के कारण है; और इन सब का मूल अज्ञान है।
तीसरा है आधिदैहिक दुःख; शरीर में चोट लगना, फोड़े फुंसी होना, ज्वर आना, एलर्जी होना अर्थात किसी भी प्रकार के शारीरिक रोग। आधिदैहिक दुःख से छुटकारा पाने के लिए हम प्रायः किसी डॉक्टर ,वैध या हकीम के पास दौड़ते हैं।
अब प्रश्न यह है कि इन दुःखों के मूल कारण अज्ञान को क्या हम दूर करने का प्रयास कर रहे हैं?
"विकास" नामक राक्षस को उत्पन्न कर हम आधिभौतिक और दैहिक दुःखों को लगातार निमन्त्रण दे रहे है और मन में ईर्ष्या, अहंकार लालच और रोग भरकर स्वयं की बुद्धि और शरीर को नष्ट कर रहे हैं। प्रकृति ईश्वर-प्रदत्त सर्वगुण-सम्पन्न पूंजी है जो ईश्वर ने दयापूर्वक जीवों को जीवन जीने के लिए प्रदान की है, किन्तु प्रकृति का सबसे बुद्धिमान जीव मानव ने लालचवश अन्य जीवों का हक़ छीनकर केवल अपने लाभ के लिए इसका अन्यायपूर्ण तरीके से अतिदोहन कर डाला। इसी कारण दुःख विकास के साथ साथ कम होने की अपेक्षा दिन प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे है। साधन जिस अनुपात में बढ़ रहे सुख उसी अनुपात में कम हो रहा है। तीनों में से कम से कम एक दुःख से तो छुटकारा मिलें!
हमारी सनातन परम्परा में एक शब्द 'योग' इन सभी दुःखों के हमे दूर करता है।
योग; मानव और प्रकृति में मध्य।
योग; मानव और ईश्वर के मध्य।
योग,प्रकृति और ईश्वर के मध्य।
तीनों प्रकार के योग में मानव मध्य में है और मानव ही यह योग बना सकता है। इस विश्व में ईश्वर के बाद यदि कोई उच्चतम शक्ति है तो वह मानव है। उसके अच्छे कर्म पूरी सृष्टि को लाभ देते है और बुरे कर्म पूरी सृष्टि को नष्ट कर सकने में सक्षम है। अतः"विकास" द्वारा उत्पन्न बड़ी समस्या 'प्रदूषण' का हल सनातन जीवन पद्धति में ही प्राप्त होगा। इसके लिए पहले तेजी से हिन्दूओं को अपने स्वरूप को पहचान कर प्रकृति से समझौता करते हुए मर्यादित जीवन पद्धति को अपनाना होगा और फिर पूरे विश्व में योग के सभी स्वरूपों को पहुँचाना होगा।
ॐ
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