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जुलाई, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

वेद के प्रकाश से प्रकाशित

जब महर्षि दयानंद का स्वर गूंजा कि वेदों की ओर लौटो तो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों ने ऋषि को अनपढ़ की संज्ञा दे दी। उन्हें आधुनिकता और विकास के विरुद्ध माना गया। किंतु वह तथाकथित प्रबुद्ध लोग यह भूल गए कि रात्रि का विकास सदैव सुबह में होता है और वेद तो सुबह का सूर्य है। सूर्य जो पिछली रात पश्चिम की गोद में जा चुका था अब पुनः पूरब की गोदी में अंगड़ाई लेकर आने वाला है। वेदों की ओर लौटने अर्थ यही तो है कि ज्ञान का सूर्य पुनः उगाकर इस विश्व को प्रकाशित किया जाए। हमारे पास ज्ञान का विपुल भंडार है इसे अपने जीवन में उतारा जाए। हमारे ऋषियों महर्षियों की वर्षों की तपस्या के तप का प्रकाश विभिन्न सूत्रों और श्लोकों के रूप में वेद नामक सूर्य से निःसृत हो रहा है। उससे हमें आत्मसात करना है। उस ज्ञान को हमें अपने आचरण में ढालना है। हमें सत्य को पहचानना है, सत्य में जीना है, सत्य रहना है, सत्य को खोजना है, सत्य को जानना है, और सत्य को अपना जीवन बनाना है। जब चारों और असत्य का साम्राज्य हूं तो सत्य का मार्ग कांटो भरा होता है किंतु इस साम्राज्य को नष्ट करके सत्य के मार्ग को सुगम बनाया जा सकता है इसलिए हमें...

प्रहरी

अभी-अभी कारगिल विजय दिवस बड़ी धूमधाम से पूरे देश में मनाया गया। प्रत्येक देशवासी ने युद्ध में शहीद हुए प्रहरियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। देश का बच्चा बच्चा इन अमर शहीदों का ऋणी है। वे लोग सीमा पर जागते हैं तो हम लोग अपने घरों में चैन से सो जाते हैं। देश की सेना अर्ध सैनिक बल एवं अन्य सुरक्षाकर्मियों को कोटि कोटि नमन बार बार नमन। यह लोग नहीं है ऐसे ही नहीं है पूरे देश को इन पर गर्व है और कोई एक संगठन जिस पर हर कोई गर्व कर सकता है वह सामान्य कार्य तो नहीं करता। प्रहरी का कार्य निश्चित रूप से कंटकों दुर्गम और कठिन है। ऐसा नहीं है कि प्रहरी का महत्व पाकिस्तान के जन्म के साथ या चीन के जन्म के साथ या भारत के आजाद होने के साथ ही बढा हो। जब से मानव ने खानाबदोश की जिंदगी को छोड़कर इकट्ठे होकर कबीलों में रहना सीखा है तब से प्रहरियों का जीवन में बड़ा महत्व रहा है। जिस प्रकार देश के प्रहरी हमारी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है इसी प्रकार पुराने समय में कबीलों, जनपदों, राज्यों के प्रहरी भी अपनी जनता की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। और इसीलिए संभवत था प्रहरियों को समय का ताज पहनाया गया है। प्...

भोला और भांग

शिव ,शंकर, महादेव ,भोला बाबा, आदि नामों से जाने जाने वाले भगवान शिव आज शिव भक्तों के द्वारा ही परिहास का विषय बन कर रह गए हैं। शिव जो परम शक्ति है, सृष्टि कर्ता है,सृष्टिपालक है, सृष्टि संहारक है और जीवन का मूल है उस भगवान शिव को लोगों ने भांड बना कर रख दिया है, भंगड़ बना कर रख दिया है, और शिव की शक्ति मां पार्वती का तो जैसे बस एक ही काम रह गया है भांग के पत्ते तोड़ने उसको घोटने में घोटना और शिव को पिलाना। कावड़ियों द्वारा बजाए जा रहे भक्ति संगीत में आप यह सब सुन सकते हैं महसूस कर सकते हैं कि किस तरह ईश्वरीय प्रतीक को एक मानवीय रूप देकर उसका चरित्र हनन किया जा रहा है। लोग ऐसे ऐसे कथित भजन सुनकर नाचते हैं कूदते हैं, जय जय कार करते हैं । यह लोग समाज के समक्ष कौन सा आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं? ईश्वर के विषय में एक बात स्पष्ट है कि वह है सृष्टि को उत्पन्न करता है पोषण करता है और संघार करता है किंतु उसमें सम्मिलित नहीं है आसक्त नहीं है। वह तो पूरी सृष्टि को कर्म करने के लिए स्वतंत्र रखता है। उसकी स्थिति प्रतिकात्मक रूप से ऐसी होती है जैसे एक भांग पिए हुए व्यक्ति की स्थिति होती है जिसे अपने ...

नाम व उपनाम

कुछ दिन पहले एक मित्र ने Facebook एक पोस्ट लिखी। पोस्ट का मुख्य विषय जातिवाद का विरोध करना था। पोस्ट बहुत अच्छी थी किंतु कॉमेंट में किसी महानुभाव ने उनसे ही अपना उपनाम नाम के पीछे से हटाने की बात कह दी। वह मित्र इसके लिए सहर्ष तैयार भी हो गये। किंतु इस बातचीत में मेरे मन में कुछ हलचल सी मच गई। बचपन से मैं स्वयं हूं उपनाम से दूर ही रहा हूं। किंतु अब मुझे लगता है नाम और उपनाम जीवन में इन दोनों की उपयोगिता है। हम प्रायःअपने बच्चों का नाम देवियों देवताओं ऋषियों मुनियों एवं प्रतापी राजा आदि के नामों से लेकर ही रखते हैं।यदि किसी अन्य प्रकार का नाम रख दिया जाये तो समाज के लोग न केवल आश्चर्यचकित होते है अपितु ऐसा नाम न रखने की सलाह भी देते है। ऐसा क्यों होता है? इसका रहस्य हमारे समाज की मनोवैज्ञानिक परंपराओं में छुपा हुआ है। आप एक व्यक्ति को लगातार पागल व्यक्ति कहकर संबोधित कीजिए कुछ समय बाद आप उस व्यक्ति में पागलपन को महसूस कर सकेंगे। क्योंकि बार बार ऐसा संबोधन सुनने पर उसके मन में यह विचार घर कर जाता है कि वह अन्य लोगों से अलग है और उसमें कुछ तो कमी है और फिर मन इस बात को मानने लगता है और ...

भूख

अंग्रेजी भाषा में एक शब्द है पावर। हमारे स्कूलों में बच्चे भी पढ़ते हैं शक्ति अथवा सामर्थ्य। यह एक अमूर्त शब्द है। शक्ति एक ऐसा लुभावन शब्द है जो सबको चाहिए। व्यक्ति से लेकर देश तक सबको। क्योंकि पावर शक्ति व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से अलग कर ऊंचा स्थान प्रदान कर देती है। और प्रत्येक व्यक्ति सत्ता के लालच में प्रायः गर्त में गिरता चला जाता है। आखिर शक्तिशाली हो कर हम प्राप्त क्या करना चाहते हैं? सृष्टि कर्ता ने सभी जीवो के लिए यथायोग्य जीवन यापन के साधन उपलब्ध कराए हैं। मानव की तो उनमें से एक है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है के इस सृष्टि में 84 लाख योनियां जीवों की है। क्या आपने किसी भी जीव को भूख से मरते देखा है? फिर सब जीवों से अधिक दिमाग वाला, सब जीवों से अधिक श्रेष्ठ, सब जीवों से अधिक बुद्धिमान और सब जीवो से अधिक पावरफुल मनुष्य ही भूख से क्यों मरता है? केवल मनुष्य में ही गरीबी और अमीरी का भेदभाव क्यों है? क्या इसके पीछे का कारण विधाता की कोई चूक है? नहीं। इसका कारण मानव की तीसरी भूख है। अब आप कहेंगे क्या भूख के भी प्रकार होते हैं? जी हां भूख के भी प्रकार होते हैं। एक भूख है जो...

राजचरित्र

भारत में सब कोई भी हिंदू होगा जिसने रामायण नहीं पड़ी होगी या रामायण के विषय में नहीं सुना होगा या टेलीविजन पर रामायण नहीं देखी होगी। जो रामायण के विषय में जानते हैं वे श्री राम के विवाह के विषय में भी अच्छे से जानते हैं। श्री राम का विवाह जनक सुता सीता के साथ संपन्न हुआ था। जनक एक राजा थे किंतु महापंडित बहुत विद्वान थे। क्या आप जानते हैं राजा जनक का असली नाम सीरध्वज था। नाम बदलने का चलन तो भारतीय सिनेमा के नायकों में है फिर इन असली नायकों को नाम बदलने की क्या आवश्यकता थी? वास्तव में अचानक एक उपाधि थी जब मिथिला के नरेशों को परंपरागत रुप से प्राप्त हुई थी। और यह परंपरा ऐसे ही नहीं बन गई थी। हम राम राज्य की बात करते हैं जिसमें हर व्यक्ति अपने अपने धर्म के अनुसार कार्य करके सुखी और संपन्न था। किंतु उस रामराज्य की प्रेरणा श्रीराम को भी मिथिला के राजा से मिली थी। जनता अपने राजा को पिता के समान मानती थी। और पिता का एक पर्यायवाची जनक होता है इसलिए मिथिला पर राज करने वाले राजा जनक कहलाते थे। राजा शिव ध्वज की विद्वता जगत प्रसिद्ध है। राजा का विधान होना अति आवश्यक है। उसमें राजाओं का संबल धर्म...

भिक्षा : सुसंस्कृत और विकृत

आवाज आई।भिक्षां देहि! दरवाजे पर पहुंचा तो देखा एक 13-14 बरस का बालक हाथ में कमंडल लिए सामने खड़ा था। मुझे लगा अवश्य यह बालक आने वाले समय का महान व्यक्ति है। मैंने उसके मनवांछित भिक्षा उसको दी और भोजन के लिए आग्रह किया। बालक भोजन के लिए रुक गया। भोजन के पश्चात उसने एक पैकेट सिगरेट की मांग की। मैंने कहा इस उम्र में नशा अच्छा नहीं होता। जिंदगी में नशा किसी भी उम्र में अच्छा नहीं होता,किंतु इस उम्र में तो कदापि नहीं। यह लत तुम्हें कहां से लगी?तो उसने कहा सिगरेट मेरे गुरु जी का प्रसाद है। गुरुजी पीते हैं हम से मंगाते हैं और हमें ही पिलाते हैं। इसलिए ज्यादा नहीं बस एक पैकेट सिगरेट ला दो । मैं इसके लिए तैयार नहीं था तो वह बालक वहां से चला गया लेकिन मन में बहुत कुछ बड़बड़ाता हुआ गया। मैंने कुछ शब्द सुने, मक्खी चूस जैसे शब्द का प्रयोग किया था। मैं सोचने लगा क्या सच में यह आगे चलकर महान होगा? महात्मा का वेश धारण करने से ही कोई महात्मा तो नहीं होता। वेश धारण करना एक अलग बात है; आत्मा को महान करने के लिए महान तप की आवश्यकता है। ऐसे नशेड़ी गुरु के पास क्या सच में यह महान विद्या प्राप्त कर पाएगा? ...

आधुनिक विज्ञान का मूल

परमाणु सिद्धांत के आविष्कारक : परमाणु बम के बारे में आज सभी जानते हैं। यह कितना खतरनाक है यह भी सभी जानते हैं। आधुनिक काल में इस बम के आविष्कार हैं- जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर। रॉबर्ट के नेतृत्व में 1939 से 1945 कई वैज्ञानिकों ने काम किया और 16 जुलाई 1945 को इसका पहला परीक्षण किया गया। हालांकि परमाणु सिद्धांत और अस्त्र के जनक जॉन डाल्टन को माना जाता है, लेकिन उनसे भी 2500 वर्ष पर ऋषि कणाद ने वेदों वे लिखे सूत्रों के आधार पर परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था। भारतीय इतिहास में ऋषि कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना जाता है। आचार्य कणाद ने बताया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। कणाद प्रभास तीर्थ में रहते थे। विख्यात इतिहासज्ञ टीएन कोलेबु्रक ने लिखा है कि अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ यूरोपीय वैज्ञानिकों की तुलना में विश्वविख्यात थे। तो आपको क्या लगता है ? क्या विज्ञान एक नई विधा है। नही। ऊपर तो यह एकमात्र उदाहरण है । ऐसे लाखो उदाहरण हमारे वेदों में,  हमारे दर्शनों में देखने को मिल जाएंगे जिसने आज के विज्ञान की नीव रखी है ।आज पश्चिम सभी नई खोजों पर अपना अधिकार ...

सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

मन सनातन

विषय भोगों से सना तन  मन सनातन मांस मज्जा से बना तन ,  मन सनातन ज्ञान गीता भागवत का सुना करते और सपने स्वर्ग के हम बुना  करते मंदिरों में चढ़ाया करते   चढ़ावा कर्मकांडों को बहुत देते बढ़ावा तीर्थाटन ,धर्मस्थल ,देवदर्शन मगर माया मोह में उलझा रहे मन सोच है  लेकिन पुरातन मन सनातन कामनाये  ,काम की, हर दम मचलती लालसाएं कभी भी है  नहीं घटती और जब कमजोरियों का बोध आता कभी हँसते ,या स्वयं पर क्रोध  आता इस तरह संसार के   बंध  गए बंधन समस्यायें आ रही है नित्य  नूतन तोड़ बंधन ,करें चिंतन मन सनातन मदन मोहन बाहेती'घोटू'

शब्द का गुरु अर्थ

आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सर्वप्रथम आप सभी जिज्ञासुओं को कोटि कोटि शुभकामनायें ।  गुरु का हमारे जीवन में बड़ा महत्व है। गुरु हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश भर देते है जिसकी रोशनी में हम सारा जीवन ख़ुशी ख़ुशी गुजार देने में सक्षम हो जाते है  गुरु एक बड़ा शब्द है। इसका अर्थ उससे कहीं अधिक बड़ा है जितना हम प्रायः समझते है।गुरु केवल एक व्यक्ति ही नही होता, अपितु प्रकृति में जो भी जड़ चेतन हमें ज्ञान के प्रकाश से भर दे वह सब जेके सब हमारे गुरु है।जब हम दीपक से स्वयं जलकर दूसरों के जीवनपथ में उजाला करना सीख जाये तो वह दीपक भी हमारा गुरु है।जब हम हवा से दूसरों को शीतलता प्रदान करना सीख जाएँ तो हवा हमारी गुरु है। जब हम पक्षी से उड़ान भरना सीख जाये तो पक्षी हमारे गुरु है। और जीवन में सबसे पहले ज्ञान देने वाली हमारी माता हमारी गुरु हैहाथ पकड़कर जीवनपथ का प्रथम दर्शन कराने वाले हमारे पिता हमारे गुरु है। ऋषियों  राजाओं और जानवरों की कहानियों से जीवन का सार समझाने वाली दादी व नानी हमारी गुरु है। हमारा परिवार, गांव , देश हमारे गुरु है। केवल इतना ही नही जिन देवताओं ने हमे विभिन्न प्रकार से अन...