जब महर्षि दयानंद का स्वर गूंजा कि वेदों की ओर लौटो तो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों ने ऋषि को अनपढ़ की संज्ञा दे दी। उन्हें आधुनिकता और विकास के विरुद्ध माना गया। किंतु वह तथाकथित प्रबुद्ध लोग यह भूल गए कि रात्रि का विकास सदैव सुबह में होता है और वेद तो सुबह का सूर्य है। सूर्य जो पिछली रात पश्चिम की गोद में जा चुका था अब पुनः पूरब की गोदी में अंगड़ाई लेकर आने वाला है। वेदों की ओर लौटने अर्थ यही तो है कि ज्ञान का सूर्य पुनः उगाकर इस विश्व को प्रकाशित किया जाए। हमारे पास ज्ञान का विपुल भंडार है इसे अपने जीवन में उतारा जाए। हमारे ऋषियों महर्षियों की वर्षों की तपस्या के तप का प्रकाश विभिन्न सूत्रों और श्लोकों के रूप में वेद नामक सूर्य से निःसृत हो रहा है। उससे हमें आत्मसात करना है। उस ज्ञान को हमें अपने आचरण में ढालना है। हमें सत्य को पहचानना है, सत्य में जीना है, सत्य रहना है, सत्य को खोजना है, सत्य को जानना है, और सत्य को अपना जीवन बनाना है। जब चारों और असत्य का साम्राज्य हूं तो सत्य का मार्ग कांटो भरा होता है किंतु इस साम्राज्य को नष्ट करके सत्य के मार्ग को सुगम बनाया जा सकता है इसलिए हमें...