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राजचरित्र


भारत में सब कोई भी हिंदू होगा जिसने रामायण नहीं पड़ी होगी या रामायण के विषय में नहीं सुना होगा या टेलीविजन पर रामायण नहीं देखी होगी। जो रामायण के विषय में जानते हैं वे श्री राम के विवाह के विषय में भी अच्छे से जानते हैं। श्री राम का विवाह जनक सुता सीता के साथ संपन्न हुआ था। जनक एक राजा थे किंतु महापंडित बहुत विद्वान थे। क्या आप जानते हैं राजा जनक का असली नाम सीरध्वज था। नाम बदलने का चलन तो भारतीय सिनेमा के नायकों में है फिर इन असली नायकों को नाम बदलने की क्या आवश्यकता थी? वास्तव में अचानक एक उपाधि थी जब मिथिला के नरेशों को परंपरागत रुप से प्राप्त हुई थी। और यह परंपरा ऐसे ही नहीं बन गई थी। हम राम राज्य की बात करते हैं जिसमें हर व्यक्ति अपने अपने धर्म के अनुसार कार्य करके सुखी और संपन्न था। किंतु उस रामराज्य की प्रेरणा श्रीराम को भी मिथिला के राजा से मिली थी। जनता अपने राजा को पिता के समान मानती थी। और पिता का एक पर्यायवाची जनक होता है इसलिए मिथिला पर राज करने वाले राजा जनक कहलाते थे। राजा शिव ध्वज की विद्वता जगत प्रसिद्ध है। राजा का विधान होना अति आवश्यक है। उसमें राजाओं का संबल धर्म होता था। जब राजा धार्मिक होता था तो प्रजा उससे भी दो हाथ आगे होती थी। तभी तो कहते हैं जैसा राजा वैसी प्रजा। आज राजाओ ने धर्म से दूरी बना ली। इसी का नतीजा हम देख रहे हैं कि राजाओं के साथ-साथ नागरिकों का भी चरित्र हनन हो चुका है। झूठ, चोरी, व्याभिचार, यह भ्रष्टाचार, बलात्कार, एक दूसरे का सम्मान ना करना आदि दोष आज प्रचलन में आ गए हैं। आजकल तो धर्म के नाम पर भी भ्रष्टाचार और व्यभिचार आम बात हो गई है। जो लोग धर्म का सम्मान करते हैं उन्हें इस विषय में सोचना होगा। धर्म की रक्षा बड़े-बड़े भाषण से नहीं होगी, मंदिरों में जाने से नहीं होगी, लंगर लगाने से नहीं होगी, अपितु आचरण में परिवर्तन होने से होगी। केवल नारे लगाने से धर्म का सम्मान नहीं होता, किसी दूसरे संप्रदाय को गाली देने से भी धर्म का सम्मान नहीं होता। सड़कों पर राम-राम चलाने से भी धर्म का सम्मान नहीं होता। हमारे मंदिर सांस्कृतिक एकता की धरोहर तो है किंतु धर्म के वाहक नहीं हो पा रहे हैं। कारण यह है कि पुजारी मंदिर की कमाई बढ़ाने के लिए पाखंड को बढ़ावा दे रहे हैं। क्योंकि वह जानते हैं मंदिर का ईश्वर उस धन को लेने के लिए नहीं आएगा वर्धन तो उन्हीं पुजारियों पंडितों के लिए होगा। जो मंदिर धार्मिक एकता के प्रतीक है वह आज व्यवसायिक होते जा रहे हैं। हम किसी भी फकीर को भगवान बना देते हैं और भूल जाते हैं कि भगवान वह है जो सृष्टि की रचना करता है और सृष्टि की रचना कोई इंसान नहीं कर सकता। इसलिए जो व्यक्ति उम्र भर भिक्षाटन करके खाता है वह ईश्वर या ईश्वर का अवतार नहीं हो सकता। धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक है कि शास्त्रों के समुचित अध्ययन की व्यवस्था हो। शास्त्रों के वचन पाठन और श्रवण के लिए लोग दें। तभी कोई सीरध्वज जनक बन सकता है। अन्यथा रामराज्य के स्वप्न को स्वप्न ही रहने दो। क्या आप ऐसा कर सकते हैं?

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