सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

वेद के प्रकाश से प्रकाशित


जब महर्षि दयानंद का स्वर गूंजा कि वेदों की ओर लौटो तो पढ़े-लिखे प्रबुद्ध लोगों ने ऋषि को अनपढ़ की संज्ञा दे दी। उन्हें आधुनिकता और विकास के विरुद्ध माना गया। किंतु वह तथाकथित प्रबुद्ध लोग यह भूल गए कि रात्रि का विकास सदैव सुबह में होता है और वेद तो सुबह का सूर्य है। सूर्य जो पिछली रात पश्चिम की गोद में जा चुका था अब पुनः पूरब की गोदी में अंगड़ाई लेकर आने वाला है। वेदों की ओर लौटने अर्थ यही तो है कि ज्ञान का सूर्य पुनः उगाकर इस विश्व को प्रकाशित किया जाए। हमारे पास ज्ञान का विपुल भंडार है इसे अपने जीवन में उतारा जाए। हमारे ऋषियों महर्षियों की वर्षों की तपस्या के तप का प्रकाश विभिन्न सूत्रों और श्लोकों के रूप में वेद नामक सूर्य से निःसृत हो रहा है। उससे हमें आत्मसात करना है। उस ज्ञान को हमें अपने आचरण में ढालना है। हमें सत्य को पहचानना है, सत्य में जीना है, सत्य रहना है, सत्य को खोजना है, सत्य को जानना है, और सत्य को अपना जीवन बनाना है। जब चारों और असत्य का साम्राज्य हूं तो सत्य का मार्ग कांटो भरा होता है किंतु इस साम्राज्य को नष्ट करके सत्य के मार्ग को सुगम बनाया जा सकता है इसलिए हमें वेदों को पुनः अपनाना है और वेदोक्त आचरण से मैं केवल स्वयं का विकास करना है बल्कि अपने देश को भी गुरुत्व की चोटी पर विराजमान करना है। महर्षि के कथन का इसलिए पालन न करो कि यह किसी व्यक्ति ने कहा है ।महर्षि पर विश्वास करना, विश्वास न करना यह व्यक्तिगत प्रश्न है। किंतु व्यक्ति को बुद्धि के रूप में एक ईश्वरीय शक्ति प्राप्त हुई है। उस शक्ति का उपयोग सत्य को पहचानने में करेंगे तो हम स्वयं ही पाएंगें कि ऋषि सत्य ही कह रहे हैं। धरती पर पत्थर बिछाकर सड़कें खास और इमारतें खड़ी करना विकास नहीं है। धरती की हरियाली को उजाड़ कर उस पर अपनी महत्वकांक्षाओं के पत्थर सजाना विकास नहीं है। विकास तो प्रकृति के साथ तालमेल करके सह जीवन यापन करना है। विकास तो शास्त्रानुसार जीवन जीना है। तो आइए वेदों का सूर्य हमें प्रकाश देने के लिए उगा हुआ है। उस सूर्य को अर्ध्य-पाद्य दे और उस प्रकाश को अपने जीवन में समाहित करके ईश्वरीय प्रकाश का एक भाग बने। वेदों की ओर लौट चलो।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

रूद्र के स्वरूप की पड़ताल

भगवान शिव का रूद्र नामक भयंकर रूप क्यों है? क्यों उनका रँग काला है? उनके पाँच मुख कौन कौन और कैसे है?उनकी दस भुजाओं का रहस्य क्या है? उनके तीन नेत्र कौन कौन से है? और उनके त्रिशूल का क्या अर्थ है? प्रतीकों में रमण करने वाले हिन्दुओं!क्या कभी इन प्रश्नों पर विचार किया है? तथाकथित पढ़े-लिखे लोग इस मूर्तियों को देखकर हँसते है। उनके हँसने का कारण भगवान शिव का वह स्वरूप ही नही है अपितु हमारे द्वारा उस स्वरूप को भगवान मान लेना है। हम उस प्रतीक में ही खुश है। उस मूर्ति के मुँह में लड्डू ठूँसकर भगवान की पूजा करके सन्तुष्ट हैं। न तो हम भगवान को जानने का प्रयास करते हैं और न हँसने वाले मूर्खों की जिज्ञासा शान्त कर सकते है। यही कारण है कि अपने धर्म से अनभिज्ञ हिन्दू धर्म से ही पलायन कर रहे हैं। दूसरे धर्म में व्याप्त पर्याप्त वासना उन्हें आकर्षित कर रही है। अतः विद्वपुरुषों ! अपने धर्म के मर्म को समझो और अन्य को भी समझाओ। हमने इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आपसे अनुरोध है कि उसको प्रचारित करें। उपनिषदों के एक एक श्लोक को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम u tube पर भी हैं और इस ब्लॉग पर तो ह...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...