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नाम व उपनाम


कुछ दिन पहले एक मित्र ने Facebook एक पोस्ट लिखी। पोस्ट का मुख्य विषय जातिवाद का विरोध करना था। पोस्ट बहुत अच्छी थी किंतु कॉमेंट में किसी महानुभाव ने उनसे ही अपना उपनाम नाम के पीछे से हटाने की बात कह दी। वह मित्र इसके लिए सहर्ष तैयार भी हो गये। किंतु इस बातचीत में मेरे मन में कुछ हलचल सी मच गई। बचपन से मैं स्वयं हूं उपनाम से दूर ही रहा हूं। किंतु अब मुझे लगता है नाम और उपनाम जीवन में इन दोनों की उपयोगिता है। हम प्रायःअपने बच्चों का नाम देवियों देवताओं ऋषियों मुनियों एवं प्रतापी राजा आदि के नामों से लेकर ही रखते हैं।यदि किसी अन्य प्रकार का नाम रख दिया जाये तो समाज के लोग न केवल आश्चर्यचकित होते है अपितु ऐसा नाम न रखने की सलाह भी देते है। ऐसा क्यों होता है? इसका रहस्य हमारे समाज की मनोवैज्ञानिक परंपराओं में छुपा हुआ है। आप एक व्यक्ति को लगातार पागल व्यक्ति कहकर संबोधित कीजिए कुछ समय बाद आप उस व्यक्ति में पागलपन को महसूस कर सकेंगे। क्योंकि बार बार ऐसा संबोधन सुनने पर उसके मन में यह विचार घर कर जाता है कि वह अन्य लोगों से अलग है और उसमें कुछ तो कमी है और फिर मन इस बात को मानने लगता है और इस मानने के कारण उसका व्यवहार भी सामाजिक आवश्यकता के अनुरूप नहीं रह जाता और यही तो पागलपन के लक्षण है। अतः नाम एक मानसिक शक्ति है जो हमें इतिहास हो चुके उस महान व्यक्तित्व के जैसा बनने की प्रेरणा देती है जिसके नाम से आज हमारा नाम है। यह हमारे चरित्र को भी उसी दिशा में दिशा देती है। और व्यक्ति को सच्चरित्र रखना ही तो समाज का धर्म है। ऐसे में कुछ लोगों का यह कहना कि नाम में क्या रखा है सरासर अनुचित है। यद्यपि ऐसे बहुत से अपवाद है जिसमें नाम के प्रतिकूल व्यक्ति का व्यवहार पाया जाता है किंतु ऐसे लोग भी तो प्रायः अज्ञानी ही मिलते हैं। कुछ ऐसा ही उपनाम के विषय में भी कहा जा सकता है। उपनाम हमारे पूर्वजों की चरित्र को हमारे द्वारा आगे बढ़ाता है। उपनाम पितृत्व की पहचान है। पितृऋण से उरऋण होने का एक माध्यम भी है ।और अपने खानदान से विरासत में मिली अच्छी शिक्षा को अपने चरित्र में ढालने की प्रेरणा भी है । यदि आज हम झूठ, चोरी, व्यभिचार, द्वेष, ईर्ष्या आदि दुर्गुणों को समाज से समाप्त करने का विचार करते हैं तो इस विचार पद्धति में अकेले एक व्यक्ति के विचार नहीं होते अपितु उसके पूरे खानदान की पारंपरिक विचारधारा उस व्यक्ति के मन में निहित होती है। यदि खानदान की पहचान व्यक्ति के नाम से झलकती है तो इसमें बुरा क्या है? व्यक्ति के चरित्र पर दो बातों का सीधा सीधा प्रभाव पड़ता है ,पहली उसकी परवरिश किस तरह के परिवार में हुई है, किस तरह के समाज में हुई है, और दूसरी वह किस खानदान की पीढ़ी है । यदि खानदान सच्चरित्र है तो आ गए बच्चों के दुष्चरित्र होने की संभावना बहुत ही कम है मनोविज्ञान इस बात को सिद्ध कर चुका है । अतः यदि कोई व्यक्ति सच्चरित्र है तो उसके परिवार की पहचान का चिन्ह अर्थात उपनाम उस व्यक्ति के नाम के साथ जुड़ने पर एक अच्छे परिवार की ख्याति बढ़ती है जिससे अन्य लोग भी प्रेरित होते हैं और स्वयं में सुधार करने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रेरणा के लिए उपनाम होना बहुत आवश्यक है। यद्यपि कबीर जैसे कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिनके खानदान का पता न होने पर भी वह सच्चरित्र हैं लेकिन इस बात को नहीं भुलाया जा सकता कि उनके सच्चरित्र होने में उनके गुरु का हाथ बहुत बड़ा योगदान है और भारत में तो गुरु शिष्य परंपरा भी खानदान की तरह ही चलती है जिसे कोई भी कुलीन व्यक्ति कलंकित करना नहीं चाहता। अतः अपनी परंपराओं, अपने मूल्यों और अपनी पहचान के लिए नाम के साथ उपनाम जोड़ना कम से कम मुझे तो कहीं भी गलत नहीं लगता। आगे विचार अपने-अपने हैं ।आप क्या सोचते हैं? पूरा नाम बताओ

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