परमाणु सिद्धांत के आविष्कारक : परमाणु बम के बारे में आज सभी जानते हैं। यह कितना खतरनाक है यह भी सभी जानते हैं। आधुनिक काल में इस बम के आविष्कार हैं- जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर। रॉबर्ट के नेतृत्व में 1939 से 1945 कई वैज्ञानिकों ने काम किया और 16 जुलाई 1945 को इसका पहला परीक्षण किया गया।
हालांकि परमाणु सिद्धांत और अस्त्र के जनक जॉन डाल्टन को माना जाता है, लेकिन उनसे भी 2500 वर्ष पर ऋषि कणाद ने वेदों वे लिखे सूत्रों के आधार पर परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
भारतीय इतिहास में ऋषि कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना जाता है। आचार्य कणाद ने बताया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। कणाद प्रभास तीर्थ में रहते थे।
विख्यात इतिहासज्ञ टीएन कोलेबु्रक ने लिखा है कि अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ यूरोपीय वैज्ञानिकों की तुलना में विश्वविख्यात थे।
तो आपको क्या लगता है ? क्या विज्ञान एक नई विधा है। नही। ऊपर तो यह एकमात्र उदाहरण है । ऐसे लाखो उदाहरण हमारे वेदों में, हमारे दर्शनों में देखने को मिल जाएंगे जिसने आज के विज्ञान की नीव रखी है ।आज पश्चिम सभी नई खोजों पर अपना अधिकार मान लेता है यह भूल जाता है कि उसके पास आज जितना ज्ञान है सब भारत की देन है। भारत में गणित विषय पर पुरातन काल में इतनी मजबूत पकड़ बनाई थी कि पश्चिम आज तक उस ज्ञान से मालामाल हो रहा है। उनके पास पेटेंट है। हमारे ऋषि-मुनियों के अविष्कार किसी पेटेंट के मोहताज नहीं होते थे ।वह तो केवल लोक कल्याण के लिए ही आविष्कार करते थे। उनका परमाणु ज्ञान किसी प्रमाण युद्ध के लिए नहीं था। उनका परमाणु ज्ञान शांति के लिए था। भारत आज भी उसी परंपरा पर अग्रसर है और विश्व शांति के लिए अनमोल कुर्बानियां देता रहता है किंतु क्या संपूर्ण विश्व इन आदर्शों को अपना सकता है?
हालांकि परमाणु सिद्धांत और अस्त्र के जनक जॉन डाल्टन को माना जाता है, लेकिन उनसे भी 2500 वर्ष पर ऋषि कणाद ने वेदों वे लिखे सूत्रों के आधार पर परमाणु सिद्धांत का प्रतिपादन किया था।
भारतीय इतिहास में ऋषि कणाद को परमाणुशास्त्र का जनक माना जाता है। आचार्य कणाद ने बताया कि द्रव्य के परमाणु होते हैं। कणाद प्रभास तीर्थ में रहते थे।
विख्यात इतिहासज्ञ टीएन कोलेबु्रक ने लिखा है कि अणुशास्त्र में आचार्य कणाद तथा अन्य भारतीय शास्त्रज्ञ यूरोपीय वैज्ञानिकों की तुलना में विश्वविख्यात थे।
तो आपको क्या लगता है ? क्या विज्ञान एक नई विधा है। नही। ऊपर तो यह एकमात्र उदाहरण है । ऐसे लाखो उदाहरण हमारे वेदों में, हमारे दर्शनों में देखने को मिल जाएंगे जिसने आज के विज्ञान की नीव रखी है ।आज पश्चिम सभी नई खोजों पर अपना अधिकार मान लेता है यह भूल जाता है कि उसके पास आज जितना ज्ञान है सब भारत की देन है। भारत में गणित विषय पर पुरातन काल में इतनी मजबूत पकड़ बनाई थी कि पश्चिम आज तक उस ज्ञान से मालामाल हो रहा है। उनके पास पेटेंट है। हमारे ऋषि-मुनियों के अविष्कार किसी पेटेंट के मोहताज नहीं होते थे ।वह तो केवल लोक कल्याण के लिए ही आविष्कार करते थे। उनका परमाणु ज्ञान किसी प्रमाण युद्ध के लिए नहीं था। उनका परमाणु ज्ञान शांति के लिए था। भारत आज भी उसी परंपरा पर अग्रसर है और विश्व शांति के लिए अनमोल कुर्बानियां देता रहता है किंतु क्या संपूर्ण विश्व इन आदर्शों को अपना सकता है?
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