सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भोला और भांग


शिव ,शंकर, महादेव ,भोला बाबा, आदि नामों से जाने जाने वाले भगवान शिव आज शिव भक्तों के द्वारा ही परिहास का विषय बन कर रह गए हैं। शिव जो परम शक्ति है, सृष्टि कर्ता है,सृष्टिपालक है, सृष्टि संहारक है और जीवन का मूल है उस भगवान शिव को लोगों ने भांड बना कर रख दिया है, भंगड़ बना कर रख दिया है, और शिव की शक्ति मां पार्वती का तो जैसे बस एक ही काम रह गया है भांग के पत्ते तोड़ने उसको घोटने में घोटना और शिव को पिलाना। कावड़ियों द्वारा बजाए जा रहे भक्ति संगीत में आप यह सब सुन सकते हैं महसूस कर सकते हैं कि किस तरह ईश्वरीय प्रतीक को एक मानवीय रूप देकर उसका चरित्र हनन किया जा रहा है। लोग ऐसे ऐसे कथित भजन सुनकर नाचते हैं कूदते हैं, जय जय कार करते हैं । यह लोग समाज के समक्ष कौन सा आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं? ईश्वर के विषय में एक बात स्पष्ट है कि वह है सृष्टि को उत्पन्न करता है पोषण करता है और संघार करता है किंतु उसमें सम्मिलित नहीं है आसक्त नहीं है। वह तो पूरी सृष्टि को कर्म करने के लिए स्वतंत्र रखता है। उसकी स्थिति प्रतिकात्मक रूप से ऐसी होती है जैसे एक भांग पिए हुए व्यक्ति की स्थिति होती है जिसे अपने ही आनंद में आनंद है और समाज से कोई लेना-देना नहीं है। इस छोटी सी बात को गहराई से समझने की बजाय लोगों ने ईश्वर को ही भांग का नशैड़ी बना दिया है। इस बात का व्यापक प्रतिकार होना चाहिए। यह बात हमें समझनी होगी और अपनी आस्था और संस्कृति पर मानव मन के बम फोड़ कर बज रहे कथित भक्ति गीत के भ्रष्टाचार को रोकना होगा। ऐसे गीतों और भजनों पर रोक लगानी होगी जिसमें ईश्वर को केवल भांग पीने वाला मदमस्त भोला और ईश्वरीय शक्ति को भांग घोटने वाली थकी-हारी स्त्री के रूप में बार-बार दर्शाया जाता है। आपके विचारों का स्वागत है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

शिव और शक्ति के यथार्थ स्वरूप का विवेचन

चेतनाकाश स्वरूप ब्रह्म को ही भैरव या रूद्र कहते हैं। उनकी जो मनोमयी स्पंदन शक्ति है, उसे काली कहते हैं। वह शिव से भिन्न नही है। जैसे वायु व उसकी गतिशक्ति एक है, जैसे अग्नि और उसकी उष्णता एक है, वैसे ही शिव और उसकी स्पंदनशक्ति-रूपा माया दोनों एक ही हैं।जैसे गतिशक्ति से वायु और उष्णताशक्ति से अग्नि ही लक्षित होती है वैसे ही अपनी स्पंदनशक्ति के द्वारा शिव का प्रतिपादन होता है।स्पन्दन या मायाशक्ति के द्वारा ही शिव लक्षित होते है, अन्यथा नही । शिव को ब्रह्म ही समझना चाहिये, उस शान्तस्वरूप शिव का वर्णन बड़े बड़े वाणी विशारद विद्वान भी नही कर सकते। मायामयी जो स्पंदनशक्ति है, वही ब्रह्मस्वरूप शिव की इच्छा कही गयी है। वह इच्छा इस दृश्याभासरूप जगत का उसी प्रकार विस्तार करती है, जैसे साकार पुरुष की इच्छा काल्पनिक जगत का विस्तार करती है। इस प्रकार शिव की इच्छा ही कार्य करती है। निराकार ब्रह्म शिव की वह मायामयी स्पंदनशक्तिरूपा इच्छा ही इस सम्पूर्ण दृश्यजगत का निर्माण करती है। वही अपने अन्तर्गत चिदाभास के द्वारा उद्दीप्त होकर जीव-चैतन्य अथवा चितिशक्ति कही गयी है।वही जीने की इच्छा वाले प्राणियों का ज...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...