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प्रहरी


अभी-अभी कारगिल विजय दिवस बड़ी धूमधाम से पूरे देश में मनाया गया। प्रत्येक देशवासी ने युद्ध में शहीद हुए प्रहरियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। देश का बच्चा बच्चा इन अमर शहीदों का ऋणी है। वे लोग सीमा पर जागते हैं तो हम लोग अपने घरों में चैन से सो जाते हैं। देश की सेना अर्ध सैनिक बल एवं अन्य सुरक्षाकर्मियों को कोटि कोटि नमन बार बार नमन। यह लोग नहीं है ऐसे ही नहीं है पूरे देश को इन पर गर्व है और कोई एक संगठन जिस पर हर कोई गर्व कर सकता है वह सामान्य कार्य तो नहीं करता। प्रहरी का कार्य निश्चित रूप से कंटकों दुर्गम और कठिन है। ऐसा नहीं है कि प्रहरी का महत्व पाकिस्तान के जन्म के साथ या चीन के जन्म के साथ या भारत के आजाद होने के साथ ही बढा हो। जब से मानव ने खानाबदोश की जिंदगी को छोड़कर इकट्ठे होकर कबीलों में रहना सीखा है तब से प्रहरियों का जीवन में बड़ा महत्व रहा है। जिस प्रकार देश के प्रहरी हमारी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है इसी प्रकार पुराने समय में कबीलों, जनपदों, राज्यों के प्रहरी भी अपनी जनता की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे। और इसीलिए संभवत था प्रहरियों को समय का ताज पहनाया गया है। प्रहर भारतीय सनातन परंपरा में समय का मानक है। कुल मिलाकर दिन और रात में 8 प्रहर होते हैं। इन आठ प्रहर के नाम हैं : दिन के चार प्रहर- 1.पूर्वान्ह, 2.मध्यान्ह, 3.अपरान्ह और 4.सायंकाल। रात के चार प्रहर- 5.प्रदोष, 6.निशिथ, 7.त्रियामा एवं 8.उषा। संभवत है प्रत्येक प्रहर की संधि बेला प्रहरियों के बदलने का समय रहा होगा। और इसी से सैनिकों का नाम प्रहरी पड़ा होगा। तो हुआ ना सैनिकों के सर पर समय का ताज। वैसे भी देश पर वीरगति प्राप्त करने वाला व्यक्ति कभी मरता नहीं है। वह तो उस सदा अमर रहता है। वह तो समय ही हो जाता है। इस और भी अनंत उस और भी अनंत। वीर सैनिकों की इस अनंतता को पुनः कोटि-कोटि नमन। उषाकाल में उठकर ईश्वर को नमन कीजिए। पूर्वाहन में उगते सूरज के साथ आप भी अपने अपने प्रतिदिन के काम पर लग जाइए। मध्याह्न में थोड़ा भजन दीजिए थोड़ा विश्राम लीजिए। अपरान्ह में पुनः अपने कार्यों में जी जान से जुट जाइए। सांय काल दिन भर के किए कार्यों का विश्लेषण करते हुए आपको आपसे कोई गलत कार्य नहीं हुआ हो तो इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद दीजिए और यदि कुछ गलत हो गया हो तो उसके लिए ईश्वर से क्षमा याचना कीजिए। साईं कालीन भोजन आदि के बाद प्रदोष में चैन की नींद सोइए। निशिथ और त्रियामा, यह दोपहर तो केवल प्रहरियों के जागने के हैं। अतः उषाकाल में उठ कर उन प्रहरियों का भी धन्यवाद करिए जिन्होंने रात भर जागकर आपको चैन की नींद सुलाया है।

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