अंग्रेजी भाषा में एक शब्द है पावर। हमारे स्कूलों में बच्चे भी पढ़ते हैं शक्ति अथवा सामर्थ्य। यह एक अमूर्त शब्द है। शक्ति एक ऐसा लुभावन शब्द है जो सबको चाहिए। व्यक्ति से लेकर देश तक सबको। क्योंकि पावर शक्ति व्यक्ति को अन्य व्यक्तियों से अलग कर ऊंचा स्थान प्रदान कर देती है। और प्रत्येक व्यक्ति सत्ता के लालच में प्रायः गर्त में गिरता चला जाता है।
आखिर शक्तिशाली हो कर हम प्राप्त क्या करना चाहते हैं? सृष्टि कर्ता ने सभी जीवो के लिए यथायोग्य जीवन यापन के साधन उपलब्ध कराए हैं। मानव की तो उनमें से एक है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है के इस सृष्टि में 84 लाख योनियां जीवों की है। क्या आपने किसी भी जीव को भूख से मरते देखा है? फिर सब जीवों से अधिक दिमाग वाला, सब जीवों से अधिक श्रेष्ठ, सब जीवों से अधिक बुद्धिमान और सब जीवो से अधिक पावरफुल मनुष्य ही भूख से क्यों मरता है? केवल मनुष्य में ही गरीबी और अमीरी का भेदभाव क्यों है? क्या इसके पीछे का कारण विधाता की कोई चूक है?
नहीं। इसका कारण मानव की तीसरी भूख है।
अब आप कहेंगे क्या भूख के भी प्रकार होते हैं? जी हां भूख के भी प्रकार होते हैं।
एक भूख है जो हमारे उदर में उत्पन्न ना होती है और हमें भोजन की आवश्यकता महसूस कराती है। दूसरी भूख है जो वासना उत्पन्न कराती है और कभी कभी मनुष्य को दुराचारी भी बना देती है। ये दोनों प्रकार की भूख केवल मनुष्य में ही नही पायी जाती बल्कि अमूमन सभी जीवों में पाई जाती है। किंतु तीसरी भूख केवल और केवल मनुष्य में ही देखने को मिलती है। और यह है शक्ति की भूख।भूख ही तो विश्व में प्रयत्न जा कारण है। दुसरे जीवों पर शोध करने वाले बताते है कि काम वासना के लिए बहुत से नर आपस में लड़ते है किंतु भोजन के लिए किसी को लड़ते नही देखा जाता। इसका अर्थ तो यह हुआ कि भोजन के लिए उतपन्न भूख सात्विक भूख है और काम वासना के लिए उतपन्न भूख राजसिक भूख है । किंतु शक्ति की भूख जो केवल मनुष्य में ही पायी जाती है तामसिक भूख है। इस भूख के उतपन्न होने से मनुष्य दूसरे के लिए कभी विचार नही करता। उसे तो बस सब का प्राकृतिक अधिकार अकेले को चाहिए। दूसरों के भाग को बलपूर्वक अपनी तिजोरी में बंद करना ही तो शक्ति है।यही भूख प्रकृति में असंतुलन का कारण है। इसी भूख से ही मनुष्य मनुष्य में अमीरी और गरीबी की खाई गहनतम होती चली जाती है।
क्या आपने कभी सोचा है कि इस भूख के उत्पन्न होने का कारण प्राकृतिक तो बिल्कुल भी नहीं है। यह तो मनुष्य की उपज है। इस भूख का मुख्य कारण है मनुष्य का शास्त्रों से दूर होना, वेदों से दूर होना, स्वधर्म से दूर होना, अपने कर्तव्यों से दूर होना, मानवता से दूर होना और सतकर्मो से दूर होना। मनुष्य केवल अधिकारों की बात करता है किंतु अपने कर्तव्यों को सदैव भूल जाता है। मनुष्य इस विश्व में केवल अपने लिए सोचता है और यह भूल कर बैठता है कि उसके जैसे करोड़ों जीव और भी हैं और उनकी पोषण माता यही धरती माता है। सबको माता के आंचल में जीने का समान अधिकार है। धरती माता अपने सब बच्चों के लिए पर्याप्त मात्रा नहीं धन धान्य उत्पन्न करती है। सब जीव तो इसका बंटवारा अपनी अपनी आवश्यकता अनुसार कर लेते हैं लेकिन मनुष्य अधिक से अधिक बटोरने में लग जाता है जिसका परिणाम यह होता है की कुछ मनुष्य तो बहुत अधिक बटोर लेते हैं और कुछ के हाथ कुछ भी नहीं लगता और यह कुछ लोग भूख से विकल हो मरने को विवश हो जाते हैं। और दुख की बात तो यह है किन मरने वालों ने अधिकतर लोग वह होते हैं जो धन धान्य उत्पन्न करने वाले होते हैं।
हम मनुष्य की उच्छ्रंखल जीवन शैली को धर्म ही नियंत्रित करता है। इसकी आवश्यकता है जल का लोटा लेकर मंदिर में पंक्ति में खड़े हुए पुजारी मात्र रह रह कर धार्मिक मानव बने और प्रकृति से अपने अधिकार अपने कर्तव्यों के साथ ग्रहण करें तथा जो हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर है उस पर बिल्कुल नियत ने धरे।
विक्रम सिंह
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