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भिक्षा : सुसंस्कृत और विकृत


आवाज आई।भिक्षां देहि! दरवाजे पर पहुंचा तो देखा एक 13-14 बरस का बालक हाथ में कमंडल लिए सामने खड़ा था। मुझे लगा अवश्य यह बालक आने वाले समय का महान व्यक्ति है। मैंने उसके मनवांछित भिक्षा उसको दी और भोजन के लिए आग्रह किया। बालक भोजन के लिए रुक गया। भोजन के पश्चात उसने एक पैकेट सिगरेट की मांग की। मैंने कहा इस उम्र में नशा अच्छा नहीं होता। जिंदगी में नशा किसी भी उम्र में अच्छा नहीं होता,किंतु इस उम्र में तो कदापि नहीं। यह लत तुम्हें कहां से लगी?तो उसने कहा सिगरेट मेरे गुरु जी का प्रसाद है। गुरुजी पीते हैं हम से मंगाते हैं और हमें ही पिलाते हैं। इसलिए ज्यादा नहीं बस एक पैकेट सिगरेट ला दो । मैं इसके लिए तैयार नहीं था तो वह बालक वहां से चला गया लेकिन मन में बहुत कुछ बड़बड़ाता हुआ गया। मैंने कुछ शब्द सुने, मक्खी चूस जैसे शब्द का प्रयोग किया था। मैं सोचने लगा क्या सच में यह आगे चलकर महान होगा? महात्मा का वेश धारण करने से ही कोई महात्मा तो नहीं होता। वेश धारण करना एक अलग बात है; आत्मा को महान करने के लिए महान तप की आवश्यकता है। ऐसे नशेड़ी गुरु के पास क्या सच में यह महान विद्या प्राप्त कर पाएगा? नहीं।। लगता है घर से रुष्ट होकर निकला है। इस को दी गई भिक्षा कहीं अनुचित तो नहीं थी? मैं सोच रहा था, एक समय था जब सनातनी विद्यार्थी विद्यार्जन के लिए गुरुकुल में रहता था तब चाहे वह राजा-पुत्र हो या रंक-पुत्र गुरुकुल में रहते हुए सभी भिक्षाटन किया करते थे और प्रतिदिन का भोजन समाज से लेकर आते थे। इसमें दो उद्देश्य थे। पहला- शिक्षा ग्रहण करते हुए भोजन की उपलब्धि और दूसरा- शिक्षा ग्रहण करते हुए समाज से जुड़े रहना। समाज भी विद्यार्थियों के लिए भोजन उपलब्ध कराने में कभी पीछे नहीं हटता था। लोग जानते थे यही व्यक्ति आगे चलकर समाज को सत्य पथ पर ले जाएंगे। दूसरे ऋषि-मुनि भिक्षाटन किया करते थे । प्रतिदिन प्रतिदिन का भोजन जुटाकर वह लोग समाज कल्याण के लिए नई-नई खोज करते थे । समाज की विकृतियों को अपने ज्ञान से धोया करते थे ।वह जंगल में रहने वाले थे, झोपड़ी में रहने वाले थे, किंतु राजाओं से भी आदर पाते थे। इसलिए नहीं कि वह हाथ में कटोरा रखते थे, बल्कि इसलिए कि उनकी सत्य की खोज राजा और राज्य दोनों का मार्गदर्शन करती थी। भारत उन्हीं के बल पर विश्व गुरु था। समाज द्वारा दिया गया वह दान समाज को सत्य की राह दिखाता था। क्योंकि दान प्राप्त करने वाले सुपात्र होते थे। क्या आज आपको भिक्षा लेने वाले सुपात्र लगते हैं? आज भिक्षा के अर्थ बदल गए हैं। गरीबी की इंतहा आज भिक्षाटन का कारण है। विवशता आज भिक्षाटन का कारण है। बिजनेस आज भिक्षाटन का कारण है। और पैसा कमाना आज भिक्षाटन का कारण है। आज कोई विद्यार्थी भिक्षाटन को नहीं जाता। शिक्षा बदल गई है शिक्षा के तौर-तरीके बदल गए हैं। भिक्षा अब शिक्षा का भाग नहीं है। यह दीक्षा के बाद की दिनचर्या नहीं है। यह समाज से जुड़ने के लिए नहीं है। यह समाज को समझने के लिए नहीं है। यह तो आज देश पर शाप बन गई है। समाज का दुराचरण हो गई है। शिक्षा के स्वरूप में परिवर्तन को हम सब अंगीकार कर सकते हैं किंतु भिक्षा के स्वरुप में परिवर्तन दुर्भाग्यशाली है। "अतिथि देवो भवः" इस महावाक्य के समय में भिक्षा लेने और देने वाले के लिए हर्ष की बात थी और आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में भिक्षा के मायने बदल गए हैं। यदि आप रोजगार प्राप्त करना चाहते हैं तो अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण कीजिए और यदि आप ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं, सत्य को प्राप्त करना चाहते हैं, अपनी आत्मा के स्वरूप को जानना चाहते हैं, इस जगत के नियंता को जानना चाहते हैं; तो फिर अपने शास्त्रों का अध्ययन कीजिए। अपने सद्गुरु को तलाश कीजिए। कोई किसी के कहने से सद्गुरु नहीं हो जाता। जो आपको लगे कि यह व्यक्ति आपको आपके वांछित लक्ष्य तक पहुंचा सकता है वही सद्गुरु है। सद्गुरु आज भी धन के लालच में ज्ञान नहीं देता अपितु देश को विश्व गुरु बनाने के लिए ज्ञान बांटता है। जब तक भिक्षा ज्ञान प्राप्त करने का एक अंग है तब तक सम्मानीय है और यदि आधुनिक परिवेश में आपको कोई अविवश मजबूत हट्टा-कट्टा आदमी भीख मांगता मिले तो उसे कभी भी भिक्षा न दे और अन्य को भी प्रेरित करें कि ऐसे व्यक्ति को भिक्षा नहीं देकर परिश्रम करने को प्रेरित करें क्योंकि वह इसलिए भिक्षा नहीं मांग रहा है कि अतिरिक्त समय विद्यार्थियों के लिए बचाए बल्कि इसलिए मांग रहा है कि उसकी तिजोरी में धन बढ़ता जाए। भिक्षा जैसी पवित्र विधा को धूर्तों का बैंक भरने का कारण नहीं बनाए। समय बदल चुका है। अब भिक्षा को इतिहास बन जाना चाहिए इसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए यह अति आवश्यक है। आज के बाद किसी को भीख देने से पहले इस बात पर विचार कर लें कि क्या सच में वह भिक्षा का पात्र है??

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