सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मन सनातन

विषय भोगों से सना तन
 मन सनातन
मांस मज्जा से बना तन ,
 मन सनातन
ज्ञान गीता भागवत का सुना करते
और सपने स्वर्ग के हम बुना  करते
मंदिरों में चढ़ाया करते   चढ़ावा
कर्मकांडों को बहुत देते बढ़ावा
तीर्थाटन ,धर्मस्थल ,देवदर्शन
मगर माया मोह में उलझा रहे मन
सोच है  लेकिन पुरातन
मन सनातन
कामनाये  ,काम की, हर दम मचलती
लालसाएं कभी भी है  नहीं घटती
और जब कमजोरियों का बोध आता
कभी हँसते ,या स्वयं पर क्रोध  आता
इस तरह संसार के   बंध  गए बंधन
समस्यायें आ रही है नित्य  नूतन
तोड़ बंधन ,करें चिंतन
मन सनातन
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

सांख्य सूत्र का पहला श्लोक

सत्त्वरजस्तमसां साम्य्वस्था प्रकृतिः, प्रकृति प्रकृतेर्महान, महतोअहंकारोअहंकारात पञ्च तन्मात्रन्युभयमिन्द्रियम तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्च विश्तिरगणः । । २६ । । अर्थात [सत्त्वरजस्तमसां] सत्त्व रजस तमस की साम्यावस्था प्रकृति है, [ प्रकृतेः महान् ] प्रकृति से महत,[महतः अहंकारः ] महत से अहंकार ,[अहंकारात पञ्च तन्मात्ररिणी उभयमिन्द्रियम] अहंकार से पञ्च तन्मात्र और दोनों प्रकार की इन्द्रियां,[ तन्मात्रेभ्य स्थूलभूतानी] तन्मात्रो से स्थूलभूत [पुरुषः] और इनके अतिरिक्त पुरुष [इति पञ्चविशतिः गणः ]यह पच्चीस का गणः अर्थात संघ समुदाय है। यह सांख्य दर्शन के पहले अध्याय का छब्बीसवा सूत्र है इसमें स्पष्ट है जगत का मूल कारण मूल प्रकृति है किन्तु इस जड़ के अतिरिक्त पुरुष भी है और यह किस प्रकार प्रकृति में क्षोभ पैदा करता है यह सांख्य में आगे बताया गया है। पुरुष की प्रेरणा से प्रकृति साम्यवस्था से वैषम्य की और अग्रसर होती है और प्रथम तत्व प्रधान बनता है जिसमें सत्व की अत्यधिकता होती है। आपने कहा सांख्य का प्रधान जड़ नहीं चेतन है ऐसा नहीं है इसी सूत्र से आप ये समझ सकते हैं पुरुष के अत...

रूद्र के स्वरूप की पड़ताल

भगवान शिव का रूद्र नामक भयंकर रूप क्यों है? क्यों उनका रँग काला है? उनके पाँच मुख कौन कौन और कैसे है?उनकी दस भुजाओं का रहस्य क्या है? उनके तीन नेत्र कौन कौन से है? और उनके त्रिशूल का क्या अर्थ है? प्रतीकों में रमण करने वाले हिन्दुओं!क्या कभी इन प्रश्नों पर विचार किया है? तथाकथित पढ़े-लिखे लोग इस मूर्तियों को देखकर हँसते है। उनके हँसने का कारण भगवान शिव का वह स्वरूप ही नही है अपितु हमारे द्वारा उस स्वरूप को भगवान मान लेना है। हम उस प्रतीक में ही खुश है। उस मूर्ति के मुँह में लड्डू ठूँसकर भगवान की पूजा करके सन्तुष्ट हैं। न तो हम भगवान को जानने का प्रयास करते हैं और न हँसने वाले मूर्खों की जिज्ञासा शान्त कर सकते है। यही कारण है कि अपने धर्म से अनभिज्ञ हिन्दू धर्म से ही पलायन कर रहे हैं। दूसरे धर्म में व्याप्त पर्याप्त वासना उन्हें आकर्षित कर रही है। अतः विद्वपुरुषों ! अपने धर्म के मर्म को समझो और अन्य को भी समझाओ। हमने इसके लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया है। आपसे अनुरोध है कि उसको प्रचारित करें। उपनिषदों के एक एक श्लोक को संक्षिप्त व्याख्या के साथ हम u tube पर भी हैं और इस ब्लॉग पर तो ह...

अभ्यास की महिमा

यह अभ्यास का विस्तार कैसा आश्चर्यजनक है! अभ्यास से अज्ञानी भी धीरे-धीरे ज्ञानी हो जाता है, पर्वत भी पूर्ण हो जाता है, और बाण अपने महान लक्ष्य को भी भेद डालता है। देखिए, यह अभ्यास की प्रबलता कैसी है? अभ्यास से कटु पदार्थ भी मन को प्रिय लगने लगता है--- अभीष्ट वस्तु बन जाता है। अभ्यास से ही किसी को नीम अच्छा लगता है और किसी को मधु। निकट रहने का अभ्यास होने पर जो भाई बंधु नहीं है, वह भी भाई बंधु बन जाता है और दूर रहने के कारण बारंबार मिलने का अभ्यास न होने से भाई बंधुओं का स्नेह भी घट जाता है। भावना के अभ्यास से ही यह अतिवाहिक शरीर भी, जो केवल विशुद्ध चेतनाकाशरूप है, आधिभौतिक बन जाता है। यह आधिभौतिक शरीर भी धारणा के अभ्यास की भावना से पक्षियों के समान आकाश में उड़ने की सिद्धि प्राप्त कर लेता है। देखिए, अभ्यास की कैसी महिमा है? निरंतर अभ्यास करने से दुःसाध्य पदार्थ भी सिद्ध हो जाते हैं, शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और विष भी अमृत हो जाते हैं। जिसने ईष्ट वस्तु के लिए अभ्यास छोड़ दिया है, वह मनुष्यों में अधम है। वह कभी उस वस्तु को नहीं पाता। ठीक उसी तरह जैसे वंध्या स्त्री अपने गर्भ से पुत्र नह...