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अगस्त, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

भारत में जीरो और आर्यभट्ट

पिछले कुछ दिनों से कुछ अज्ञानियों द्वारा ज़ीरो और आर्यभट्ट पर बहुत कॉमेंट नजरों में आ रहे हैं। तो हमने सोचा कि क्यों न इस सत्य पर पड़े अज्ञानता के आवरण को सरका दिया जाये जिससे एक बार फिर सत्य का प्रकाश आपके ज्ञान को अपडेट करे। तो पहले बात करते है शून्य के खोज के इतिहास की। इस कहानी में राजा महाराजा नही हैं। इसमें मुनि व मनीषी भी नही हैं। इसमें है साधारण लोग जिन्हें आजकल आम लोग कहा जाता है। वे लोग जो आग जलाना सीख चुके हैं। पहिये से अपने श्रम की बचत करना भी सीख चुके हैं। खेती करना सीख चुके हैं। पशु पालना सीख चुके हैं। और उन पशुओं की गणना करना भी कुछ हद तक सीख चुके हैं।जमीन के एक टुकड़े को चारों और से लक्कडों तथा झाड़ियों आदि से घेरकर उनमें अपने पशुओं की सुरक्षा करना सीख चुके है। काम में एक दूसरे का हाथ बंटाना सीख चुके हैं। इसके लिए समय को टुकड़ो में तोडना भी उन्होंने जान लिया है। वे घड़े में रेत भरकर उसके नीचे छेद करके रेत के रित जाने को एक घट और दिनरात 24 घट में बाँट चुके है। अब उन्होंने रेत के स्थान पर जल लेकर समय के और छोटे भाग बना डाले हैं। घड़े के रीतने को 60 भागों में विभक्त कर चुके है...

स्वतन्त्र, सर्वश्रेष्ठ , हिन्दू

भारत मनीषियों का देश रहा है किंतु मनीषियों की सैंकड़ो पीढ़ियाँ सहस्त्राब्दि की दासता झेलने के बाद राजनैतिक रूप से स्वतंत्र अवश्य हो गयी है किन्तु स्वतंत्र मनन करने की क्षमता उनमें न जाने कब आएगी? मनन की अपेक्षा रट रट कर और नकल करके परीक्षा में सफल होने हो उद्यत यह पीढ़ी न जाने कब अपने सच्चे स्वरूप को पहचानेंगी? हम ऋषियों की संतान है, हम मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और महायोगी श्री कृष्ण के वंशज हैं, हमारी नस नस में गतिमान रक्त हमारे प्रबुद्ध पुर्वजों की बुद्धिमत्ता और विश्व को सत्यता के अन्वेषकों और विचारकों का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी की और बहता प्रवाह ही है। हम भी वही है किंतु अपने स्वरूप को भुला बैठे हैं और उन लोगों के पीछे रेल के डिब्बों की तरह दौड़ रहे है जिन्हें ज्ञान का ककहरा हमने सिखाया है।(पश्चिमी देशों के पीछे) अन्य सम्प्रदायों की बात करें तो वें किसी एक व्यक्ति द्वारा चलाये गये सम्प्रदाय हैं और उनके अनुयायियों को केवल उनकी बातों का अनुसरण करना ही सिखाया जाता है ताकि वे अपनी बुद्धि का प्रयोग न कर सके और और सम्प्रदाय के चलाने वाले को ही भगवान की तरह पूजते रहे। ये सम्प्रदाय हमारे च...

चरखा और नवयुवक

आजकल चरखा लोगों का एक बड़ा दुश्मन बनकर उभर रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चरखे के योगदान को नकार कर पिस्तौल को महिमामण्डित करना नवयुवकों की दिवानगी हो गयी है। हिन्दू बनना उनका शोंक बन गया है और चरखा हिन्दू होने पर कलंक जैसा हो गया है। इन मूढ़ बालकों को कैसे समझाया जाये कि चरखा हमारी दुर्बलता नही अपितु शक्ति थी, है और रहेगी। चरखा भले हो नई पीढ़ी के लिए गुजरे समय की बात हो जाये किंतु चरखा हमारी शक्ति अवश्य बना रहेगा। यह पढ़कर कुछ लोग मुझे मूर्ख समझने की भूल कर सकते हैं। मैं किसी के सोचने के निजी अधिकारों में टांग तो अड़ा नही सकता,जो यह भूल करते हैं करे! किन्तु जब हम अपने धर्म के मूल को खोकर उदाहरण स्वरूप कही गयी कहानियों और प्रतीकों में ही भटककर भी धार्मिक हो सकते है तो चरखे को कोसने से देशभक्त भी हो सकते है। यह सामान्य सी भूल हमारी संस्कृति के लिए कितनी घातक हो सकती है इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो नग्नता हम अजंता, एलोरा के समय से त्याग कर सभ्यता के आवरण में ढाँक चुके थे उसे केवल इसलिए उतार फेंक रहे है कि एक बाहरी संस्कृति ने हमे बताया कि इससे आधुनिक बना जाता है। अभी...

स्वभाव:गुणों का असन्तुलन

गीता में कहा गया है कि प्रकृति तीन गुणों सत्व, रजस और तामस का संतुलन मात्र है। इन गुणों में हलचल के परिणामस्वरूप हमे भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। यें तीन गुण ही मानव के स्वभाव को निर्धारित करते हैं। इन गुणों पर नियंत्रण करके जो मनुष्य समाज के भले के लिए चिन्तन करता हुआ व्यवहार करता है वह सत्वगुणी होता है ,जो केवल अपने लिए कर्म करता है वः रजोगुणी तथा जो समाज के विपरीत कर्म करता है वह तमोगुणी होता है। ऐसे में प्रश्न यह उतपन्न होता है कि समाज का भला कैसे हो सकता है? किस प्रकार का चिंतन समाज को उच्चआदर्शों पर ले जा सकता है? जब तक उच्चादर्श का पता नही होगा तब तक समाजहित में न तो चिंतन सम्भव है और न कर्म ।ऐसे में हम किस गुण के पोषक हैं? स्वभाव का सन्तुलित गुण तो रजोगुण ही है। इसमें व्यक्ति केवल अपनी भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करने में ही जीवन बिता देता है। इनके कर्मों को हम नैसर्गिक कर्म कह सकते है। ये कर्म वास्तव में चिन्तनरहित होते है। किन्तु तमोगुणी और सतोगुणी होना मनुष्य के ज्ञान पर आश्रित होता है। यदि यह ज्ञान व्यक्ति के स्वार्थों को पूर्ण करने तक सीमित हो तो कर्म तमोगुणी हो जाते है और यद...

शिवजी की भांग का रहस्य

एक बार एक मंदिर में भजन संध्या चल रही थी और उसमें एक गायक झूम झूम का गा रहा था... गोरा जी ने बो दी हरी हरी मेहँदी शिव जी ने बो देइ भांग ... पी के भांग भोला मारे झटके, भोला न्यू मटके भोला न्यू मटके। ये भजन तो मुझे किसी भी कोण से नही लग रहे थे। तेज संगीत की धुन पर भाँडो को नाच के नाम पर कूदने को मिल रहा था और भंगड़ो को भांग भरी चिलम मिल रही थी। मैं सोचने पर विवश हुआ कि यें शिव का महिमामंडन कर रहे है या चरित्रहनन? आखिर ऐसा क्या है कि शिवजी को इतना बड़ा व्यसनी के रूप में मंडित किया गया। क्या शिव वास्तव में भांग पीते थे? ऐसा नही था। वास्तव में वे भगवतभक्ति में चरम सीमा तक डूबे थे। मानव तन में प्रकट हुए थे तो मानव के सम्मुख स्वयं को आदर्श के रूप में रखने को भोलेनाथ ने तप का मार्ग चुना था और ब्रह्म प्राप्ति में मग्न रहते थे। योग वशिष्ठ में कहा गया है कि शास्त्र और सज्जनों की संगति से अपनी बुद्धि को शुद्ध और तीक्ष्ण करना चाहिए। यही योगी के योग की पहली भूमिका है। इसका नाम 'श्रवण' भूमिका है। ब्रह्म के स्वरूप का निरंतर चिन्तन करना 'मनन' नामक दूसरी भूमिका है। संसार के संग ...

महान संकल्पी भीष्म

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥ भावार्थ : भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है॥10॥ अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः । भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥ भावार्थ : इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें॥11॥ दुराचारी भी सदाचारी के समर्थन पर ही उछलता है।अन्यथा दुर्योधन युद्धभूमि में मामा शकुनी की सुरक्षा पहले करता किन्तु वह ऐसा नही करता क्योंकि वह जानता है कि भीष्म दृढ संकल्पी है अतः उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है। भीष्म का संकल्प जीवन भर किसी भी आतप से टूट न सका था। जीवन में कितने दबाव और झंझावात आये किन्तु भीष्म को न तोड़ सके। अम्बा जैसी सुंदर राजकुमारी भीष्म के संकल्प को तुड़वाने के लिए सभी तरह के दबाव बनाने में सफल रही। उसने राजा विचित्रवीर्य से गुहार लगाई, गुरुश्रेष्ठ परशुराम से गुहार लगाई किन्तु गुरु जिनकी इच्छामात्र भीष्म के लिए आदेश से कम न थी उनका दबाव भी भीष्म को प्रभा...

गीता का प्रथम रहस्य

गीता एक ऐसी पुस्तक है जिस पर विश्व में सबसे अधिक टिप्पणियां की गयी, सबसे अधिक भाष्य लिखे गए और सबसे अधिक लोगों के द्वारा गीता से मार्गदर्शन प्राप्त किया गया व प्रेरणा ली गई।आधुनिक समय के लगभग सभी मनीषियों ने गीता पर टिप्पणी की है। किन्तु ज्ञान के भण्डार 18 अध्यायों में से प्रथम अध्याय को मात्र परिचय के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा इस पर किसी भी मनीषी ने अधिक व्याख्या नही की है। क्या गीता जैसी ज्ञान से भरी पुस्तक में ऐसा सम्भव है कि एक अध्याय मात्र प्रसङ्ग बताने में ही खो जाए ? मुझे लगता है इसमें शोध की आवश्यकता है। महात्मा गाँधी जी ने अवश्य प्रथम अध्याय को समझने का प्रयास किया है,किन्तु उन्होंने गीता के अलग अलग श्लोक की व्याख्या न करके पूरे पूरे अध्यायों का सार प्रस्तुत किया है वह भी पत्र शैली में।किन्तु उनके प्रथम श्लोक की व्याख्या निश्चित ही प्रेरणास्पद है । धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ भावार्थ : धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या कि...

रक्षासूत्र और रक्षा की शपथ

रक्षाबन्धन का पर्व बड़े प्रेम और उल्लास से भारत सहित दुनिया भर के हिंदुओं में मनाया गया। बहनों ने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र के रूप में रंग बिरंगी राखियाँ बाँधी और माथे पर मंगल टीका लगाया था बदले में भाइयों ने बहनों को आर्थिक नेग के साथ साथ जीवन भर सुरक्षा का वचन दोहराया। यह परम्परा हमारे धर्म में अत्यंत प्राचीन है। उत्तरी ध्रुव से जब आर्य एशिया की और अपने कुरुप्रदेश को सरका रहे थे तभी ईरान तक आते आते उनमे कुछ वैमनस्य उत्पन्न हो गया और वें दो समूहों में विभक्त हो गए। ऋग्वेद का रचना भी उस समय प्रगति पर रहा होगा तभी तो वेद के पूर्वार्द्ध में सुर और असुर शब्द पर्यायवाची दिखाई पड़ते है और उत्तरार्द्ध में विलोम। यही कारण है कि ईरानी आर्य भारतीयों को और भारतीय आर्य ईरानियों को असुर समझते है। ईरानी साहित्य में सुर का अर्थ और भारतीय साहित्य में असुर का अर्थ दानव किया जाता है। सम्भवतः इन दोनों में हुआ प्रथम युद्ध ही देव-दानव युद्ध रहा हो। कहते है जब देव दानव युद्ध शुरू हुआ और देवराज इंद्र युद्ध के लिए तैयार हुए तो इन्द्राणी ने उनको तैयार करते हुये उनकी कलाई पर एक रेशम की डोरी बाँध दी ताकि वह ...

हजार सिर का हिन्दू

एक जंगल में एक विचित्र पक्षी रहता था जिसके दो सिर थे किन्तु शरीर एक था। दोनों सिर एक दूसरे से सदा झगड़ते रहते थे। एक दिन जब वे भोजन की खोज में थे तो एक सिर को स्वादिष्ट फल मिला। उसने उसकी तारीफ की तो दूसरा सिर भी उधर घूमा जिस कारण दोनों में झगड़ा हो गया। दोनों सिर जानते थे कि उनका पेट तो एक ही है ,यह खाये या वह; जाना तो उसी पेट में है, किन्तु दूसरा सिर लेने की ठान बैठा। फिर एक दिन वह पक्षी भोजन की तलाश में निकला तो दूसरे सिर को एक फल दिखाई दिया। वह उसकी और लपका तो पहले सिर ने उसे चेताया कि वह जहरीला फल है उसे मत खा किन्तु दूसरे सिर ने कहा," उस दिन तूने मुझे उस स्वादिष्ट फल का स्वाद नही चखने दिया था तो मैं अब तेरी बात क्यों मानूँ?" यह कहकर दूसरे सिर ने वह फल खा लिया।उसके बाद वह पक्षी तड़प-तड़प कर मर गया। हिन्दू धर्म भी ऐसा ही पक्षी है। इसके तो दो नही बल्कि जातियों के रूप में हजारों सिर हैं। सब एक दूसरे से सदा झगड़ते रहते हैं। सब को पता है कि उनका पेट तो एक हिंदुत्व ही है किन्तु एकदूसरे को नीचा दिखाने के लिए उस पेट में न जाने कैसे कैसे विचाररूपी फलों का भोजन भरते रहते है। यह बात ...

भाषाओं के झगड़े

बचपन में एक कहानी बड़े चाव से सुनते थे। दो बिल्लियां एक रोटी के लिए आपस में झगड़ रही थी। तभी वहाँ एक बंदर आ गया। दोनों ने अपना झगड़ा सुलझाने के लिए बन्दर की मदद माँगी।बन्दर एक तराजू लाया और रोटी के दो भाग करके अलग अलग पलड़ों में रखकर तोलने लगा। एक पलड़ा भारी होकर नीचे झुका तो बन्दर ने उस पलड़े की रोटी में से एक टुकड़ा तोडा और खा लिया। अब दूसरा पलड़ा नीचे झुक गया। बन्दर ने उस पलड़े में से रोटी का एक टुकड़ा तोडा और खा गया। अब पहला पलड़ा पुनः भरी होकर झुक गया। बन्दर ने उसमें से टुकड़ा तोडा और खा गया। इसी प्रकार रक पलड़े की रोटी समाप्त हो गयी और दूसरे पलड़े पर एक छोटा टुकड़ा बीच गया। बिल्लियाँ बोली भैया हम अपना झगड़ा खुद सुलझा लेंगे, आप हमें हमारी रोटी दे दो । इस पर बन्दर ने कहा कि यह तो मेरी मेहनत हुई और बचा टुकड़ा भी उठाकर खा गया। झगड़ने वाली बिल्लियाँ एक दूसरे का मुँह देखती रह गयी। शायद कश्मीर के मामले में भारतीय सरकार को यह कहानी ठीक लगी और पकिस्तान के किसी तीसरे देश के मध्यस्त होने के प्रस्ताव को भारत सरकार लगातार ठुकराती रही। किन्तु भाषाओं के बिल्ली की तरह झगड़े में सरकार विवेक न दिखा सकी और बीच में ...

हिन्दू पतन और उत्थान का प्रयत्न

एक व्यक्ति था। एक बार उसने सोचा कि यह आकाश मेरा है और मैं इसकी रक्षा करूंगा। यह सोचकर उसने एक बड़ा सा घर बनाया है और उसके आकाश की सुरक्षा करने लगा और संतुष्ट हो गया। किंतु काल का कराल बड़ा हठी होता है। घर टूट गया और वह व्यक्ति शोकमग्न हो गया। दुख से वह विकल हो गया। फिर उसने एक छोटा सा घर बनाया और उसके आकाश की सुरक्षा करने लगा और इसी में संतुष्ट हो गया। किंतु काल के क्रूर हथौड़े से वह भी कितने दिन बच सकता था? टूट गया। और व्यक्ति फिर से दुख और शोक से भर गया। उसके दुखों का कुछ सानी नहीं था। फिर उसने एक झोपड़ी का निर्माण किया तथा उसके आकाश पर अपना अधिकार जमकर उसकी सुरक्षा करने लगा और उसमें ही संतुष्ट रहने लगा। किन्तु कोई प्राकृतिक आपदा उसे भी नष्ट करके चली गई। मनुष्य फिर से भारी शोक में डूब गया। अब उसने एक घड़े का निर्माण किया और यह मेरा आकाश है ऐसा सोच कर उस घटाकाश की रक्षा में मग्न हो गया और संतुष्ट रहने लगा। किंतु काल ने उसे भी ग्रास बना लिया। अब वह मनुष्य पुनः दुख के सागर में डूब गया। वह मनुष्य एक सनातनी हिंदू था और जिस आकाश की वह रक्षा करता था वह था उसका धर्म। जैसे ही धर्म पर अधिका...