पिछले कुछ दिनों से कुछ अज्ञानियों द्वारा ज़ीरो और आर्यभट्ट पर बहुत कॉमेंट नजरों में आ रहे हैं। तो हमने सोचा कि क्यों न इस सत्य पर पड़े अज्ञानता के आवरण को सरका दिया जाये जिससे एक बार फिर सत्य का प्रकाश आपके ज्ञान को अपडेट करे। तो पहले बात करते है शून्य के खोज के इतिहास की। इस कहानी में राजा महाराजा नही हैं। इसमें मुनि व मनीषी भी नही हैं। इसमें है साधारण लोग जिन्हें आजकल आम लोग कहा जाता है। वे लोग जो आग जलाना सीख चुके हैं। पहिये से अपने श्रम की बचत करना भी सीख चुके हैं। खेती करना सीख चुके हैं। पशु पालना सीख चुके हैं। और उन पशुओं की गणना करना भी कुछ हद तक सीख चुके हैं।जमीन के एक टुकड़े को चारों और से लक्कडों तथा झाड़ियों आदि से घेरकर उनमें अपने पशुओं की सुरक्षा करना सीख चुके है। काम में एक दूसरे का हाथ बंटाना सीख चुके हैं। इसके लिए समय को टुकड़ो में तोडना भी उन्होंने जान लिया है। वे घड़े में रेत भरकर उसके नीचे छेद करके रेत के रित जाने को एक घट और दिनरात 24 घट में बाँट चुके है। अब उन्होंने रेत के स्थान पर जल लेकर समय के और छोटे भाग बना डाले हैं। घड़े के रीतने को 60 भागों में विभक्त कर चुके है...