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भाषाओं के झगड़े


बचपन में एक कहानी बड़े चाव से सुनते थे। दो बिल्लियां एक रोटी के लिए आपस में झगड़ रही थी। तभी वहाँ एक बंदर आ गया। दोनों ने अपना झगड़ा सुलझाने के लिए बन्दर की मदद माँगी।बन्दर एक तराजू लाया और रोटी के दो भाग करके अलग अलग पलड़ों में रखकर तोलने लगा। एक पलड़ा भारी होकर नीचे झुका तो बन्दर ने उस पलड़े की रोटी में से एक टुकड़ा तोडा और खा लिया। अब दूसरा पलड़ा नीचे झुक गया। बन्दर ने उस पलड़े में से रोटी का एक टुकड़ा तोडा और खा गया। अब पहला पलड़ा पुनः भरी होकर झुक गया। बन्दर ने उसमें से टुकड़ा तोडा और खा गया। इसी प्रकार रक पलड़े की रोटी समाप्त हो गयी और दूसरे पलड़े पर एक छोटा टुकड़ा बीच गया। बिल्लियाँ बोली भैया हम अपना झगड़ा खुद सुलझा लेंगे, आप हमें हमारी रोटी दे दो । इस पर बन्दर ने कहा कि यह तो मेरी मेहनत हुई और बचा टुकड़ा भी उठाकर खा गया। झगड़ने वाली बिल्लियाँ एक दूसरे का मुँह देखती रह गयी। शायद कश्मीर के मामले में भारतीय सरकार को यह कहानी ठीक लगी और पकिस्तान के किसी तीसरे देश के मध्यस्त होने के प्रस्ताव को भारत सरकार लगातार ठुकराती रही। किन्तु भाषाओं के बिल्ली की तरह झगड़े में सरकार विवेक न दिखा सकी और बीच में अंग्रेजी बन्दर को ले आयी। बात का प्रारंभ तो स्वतंत्रता के समय ही हो गया था जब हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार प्रारम्भ हुआ। इस पर किसी को कोई आपत्ति भी नही थी। किन्तु समस्या वहाँ खड़ी हुई जब उर्दू को पूरा पाकिस्तान देकर भी उसे भारत की दूसरी राष्ट्रभाषा बनाने की बात चली। इससे दक्षिण की भाषाएँ उखड़ गयी और पूरे दक्षिण में हिंदी और उर्दू के विरुद्ध आंदोलन की लहर फ़ैल गयी। ऐसे में राष्ट्रभाषा को 15 वर्ष के लिए वनवास देकर मामला शांत करने का निर्णय लिया गया जो बाद में गलत साबित हुआ। हिन्दी की विरोध में DMK और AIADMK जैसे राजनैतिक दलों का सृजन हुआ। भारतीय भाषाओं की इस लड़ाई का सीधा लाभ आंग्लभाषा को हुआ और भाषाएँ बिल्लियों की तरह हाथ पर हाथ रखके बैठने को विवश हो गयी। भाषाओं के इस झगड़े को समाप्त करने के आज तक कोई कारगर कदम नही उठाया गया।और तो और हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा भी अभी तक नही मिल पाया। त्रिभाषा सूत्र में भी हिन्दी भाषी क्षेत्रो में हिन्दी के अतिरिक्त संस्कृत और अंग्रेजी ने ले ली और दक्षिण में स्थानीय भाषा के अतिरिक्त अन्य पड़ोस की भाषा और अंग्रेजी ने ले ली। इन राज्यो के बीच कोई सीधा संपर्क भी नही रहा। उत्तर के लोग अपने ही दक्षिणी भाइयों को नही जानते और दक्षिण के लोग उत्तरी भाइयो की संस्कृति से अनजान है। यदि जल्द ही इन भाषाओं के मध्य कोई कारगर सेतु नही बनाया गया और जल्द ही अंग्रेजी के वर्चस्व को समाप्त नही किया गया तो न तो हमारी भाषाएँ ही सुरक्षित रहेंगी और न ही यह समृद्ध संस्कृति।

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