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गीता का प्रथम रहस्य


गीता एक ऐसी पुस्तक है जिस पर विश्व में सबसे अधिक टिप्पणियां की गयी, सबसे अधिक भाष्य लिखे गए और सबसे अधिक लोगों के द्वारा गीता से मार्गदर्शन प्राप्त किया गया व प्रेरणा ली गई।आधुनिक समय के लगभग सभी मनीषियों ने गीता पर टिप्पणी की है। किन्तु ज्ञान के भण्डार 18 अध्यायों में से प्रथम अध्याय को मात्र परिचय के रूप में प्रस्तुत किया गया है तथा इस पर किसी भी मनीषी ने अधिक व्याख्या नही की है। क्या गीता जैसी ज्ञान से भरी पुस्तक में ऐसा सम्भव है कि एक अध्याय मात्र प्रसङ्ग बताने में ही खो जाए ? मुझे लगता है इसमें शोध की आवश्यकता है। महात्मा गाँधी जी ने अवश्य प्रथम अध्याय को समझने का प्रयास किया है,किन्तु उन्होंने गीता के अलग अलग श्लोक की व्याख्या न करके पूरे पूरे अध्यायों का सार प्रस्तुत किया है वह भी पत्र शैली में।किन्तु उनके प्रथम श्लोक की व्याख्या निश्चित ही प्रेरणास्पद है । धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ भावार्थ : धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥ गीता के भाव केवल एक युद्ध की कथा के भाव तक सीमित नही है अपितु प्रत्येक मानव जीवन से सीधे जुड़े है। इसलिए इस श्लोक के अर्थ को भी एक घटना तक सीमित नही किया जा सकता। हमारा यह नश्वर शरीर धर्मक्षेत्र है जो जन्म जन्म के शुभ कर्मों के संयोग से हमे प्राप्त हुआ है। इस धर्मक्षेत्र में सदैव एक कुरुक्षेत्र विद्यमान रहता है जिसमे आमने सामने दुर्गुणों की कौरव सेना तो दूसरी और सद्गुणों की पांडव सेना है।यें सेनाएँ युद्ध की अभिलाषा से एक दूसरे के समक्ष तनी रहती है? सद्गुनियों को चिंता नही रहती कि युद्ध हुआ तो परिणाम किसके पक्ष में होगा क्योंकि उनको अपने धर्म पर विश्वास है किन्तु दुर्गुणों की पितृ सत्ता सदा आशंकित रहती है जिसका प्रतीक यहाँ धृतराष्ट्र है।सत्य को न देख पाने वाला अंधा सदा सशंकित रहता है और निर्विकार द्रष्टा (संजय) से प्रश्न करता रहता है। सद्गुण की सेना भले ही कम हो किन्तु दुर्गुणों पर सदैव भारी रहती है इसलिए मनुष्य को चाहिए कि सद्गुणों का संग्रह करे व् दुर्गुणों का त्याग।तभी जीवन सुंदर और सुरमय बनता है।

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