रक्षाबन्धन का पर्व बड़े प्रेम और उल्लास से भारत सहित दुनिया भर के हिंदुओं में मनाया गया। बहनों ने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र के रूप में रंग बिरंगी राखियाँ बाँधी और माथे पर मंगल टीका लगाया था बदले में भाइयों ने बहनों को आर्थिक नेग के साथ साथ जीवन भर सुरक्षा का वचन दोहराया।
यह परम्परा हमारे धर्म में अत्यंत प्राचीन है। उत्तरी ध्रुव से जब आर्य एशिया की और अपने कुरुप्रदेश को सरका रहे थे तभी ईरान तक आते आते उनमे कुछ वैमनस्य उत्पन्न हो गया और वें दो समूहों में विभक्त हो गए। ऋग्वेद का रचना भी उस समय प्रगति पर रहा होगा तभी तो वेद के पूर्वार्द्ध में सुर और असुर शब्द पर्यायवाची दिखाई पड़ते है और उत्तरार्द्ध में विलोम। यही कारण है कि ईरानी आर्य भारतीयों को और भारतीय आर्य ईरानियों को असुर समझते है। ईरानी साहित्य में सुर का अर्थ और भारतीय साहित्य में असुर का अर्थ दानव किया जाता है। सम्भवतः इन दोनों में हुआ प्रथम युद्ध ही देव-दानव युद्ध रहा हो।
कहते है जब देव दानव युद्ध शुरू हुआ और देवराज इंद्र युद्ध के लिए तैयार हुए तो इन्द्राणी ने उनको तैयार करते हुये उनकी कलाई पर एक रेशम की डोरी बाँध दी ताकि वह उन्हे याद दिलाती रहे कि उनको पीछे छोड़ आयी स्त्रियों, बच्चों और वृद्धों की सुरक्षा अंतिम साँस तक करनी है। इस प्रकार वह खास धागा रक्षासूत्र या राखी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। धीरे सम्भवतः उस युद्ध की विजय की वर्षगाँठ एक दूसरे को रक्षासूत्र बाँधकर मनायी जाने लगी और कालांतर में यह पर्व भाई बहनों के प्रेम की पहचान बन गया।
महाभारत में भी एक किस्सा आता है । जब युद्ध की ठन गयी और युधिष्ठिर की सेना कम रह गयी तो उन्होंने श्रीकृष्ण से पूछा कि अब उनकी विजय कैसे होगी तो श्री कृष्ण ने उन्हें अपनी सेना की कलाइयों पर रक्षासूत्र बाँधने का परामर्श दिया। युधिष्ठिर ने भाइयो सहित ऐसा ही किया और प्रत्येक सैनिक को रक्षा के लिए वचनबद्ध कर दिया।
यदि हाड़ा रानी के समय में पत्नी पति को रक्षासूत्र बाँधने का अधिकार रहा होता तो शायद उन्हें पति को प्रेमनिशानी के रूप में अपना सिर काटकर न देना पड़ता। प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अन्यों की सुरक्षा का दायित्व ले ताकि समाज में सुरक्षा , अभय और प्रेम का वातावरण सदैव बना रहे और रक्षाबन्धन के पर्व पर आपकी कलाई पर राखी हो या न हो किन्तु आपके मन में सबको सुरक्षा देने की शपथ तो होनी ही चाहिए।
इस अवसर पर मैं रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती,उदादेवी जैसी वीरांगनाओं को भी नमन करता हूँ जिन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अन्यों पर निर्भरता नही दिखाई बल्कि अपने देश और नागरिकों की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में कूद पड़ी और अपने अंतिम साँस तक इस कर्तव्य का निर्वहन किया।
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