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स्वभाव:गुणों का असन्तुलन

गीता में कहा गया है कि प्रकृति तीन गुणों सत्व, रजस और तामस का संतुलन मात्र है। इन गुणों में हलचल के परिणामस्वरूप हमे भिन्नता दृष्टिगोचर होती है। यें तीन गुण ही मानव के स्वभाव को निर्धारित करते हैं।
इन गुणों पर नियंत्रण करके जो मनुष्य समाज के भले के लिए चिन्तन करता हुआ व्यवहार करता है वह सत्वगुणी होता है ,जो केवल अपने लिए कर्म करता है वः रजोगुणी तथा जो समाज के विपरीत कर्म करता है वह तमोगुणी होता है।
ऐसे में प्रश्न यह उतपन्न होता है कि समाज का भला कैसे हो सकता है? किस प्रकार का चिंतन समाज को उच्चआदर्शों पर ले जा सकता है?
जब तक उच्चादर्श का पता नही होगा तब तक समाजहित में न तो चिंतन सम्भव है और न कर्म ।ऐसे में हम किस गुण के पोषक हैं?
स्वभाव का सन्तुलित गुण तो रजोगुण ही है। इसमें व्यक्ति केवल अपनी भौतिक इच्छाओं को पूर्ण करने में ही जीवन बिता देता है। इनके कर्मों को हम नैसर्गिक कर्म कह सकते है। ये कर्म वास्तव में चिन्तनरहित होते है। किन्तु तमोगुणी और सतोगुणी होना मनुष्य के ज्ञान पर आश्रित होता है। यदि यह ज्ञान व्यक्ति के स्वार्थों को पूर्ण करने तक सीमित हो तो कर्म तमोगुणी हो जाते है और यदि यह ज्ञान समाज के सभी व्यक्तियों को सुख प्रदान करने के लिए हो तो कर्म सतोगुणी हो जाते हैं।
इस अवस्था तक पहुंचने के लिए मानव पूर्वजो की सैंकड़ो पीढ़ियों के ज्ञान और अनुभवों और नवचिन्तन का बहुत बड़ा योगदान है।कोई व्यक्ति रातोरात ज्ञान प्राप्त नही कर सकता। सदियों के सद्चिन्तन को कर्मों में ढालकर नवचिन्तन मानव को मुनि के पद पर आसीन कर देता है, और तभी मनुष्य समाज की बदलती परिस्थियों के अनुरूप आदर्शों का निर्धारण करता है। इसके लिए चिंतनधारा पहले एक परमशुभ का निर्धारण करती है और फिर उस शुभ तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करती है।यही मार्ग समाज के सब लोगों के लिए उच्च आदर्श हो जाता है और वही परमशुभ प्रत्येक मनुष्य का लक्ष्य हो जाता है।
उस लक्ष्य के राही समाज को आनंद से , प्रफुल्लता से, प्रेम से सराबोर कर देते है और उनके पदचिह्न दिव्यता की और अग्रसर होते हुए उनको देव की पदवी पर बैठा देते है।
दिव्यता का गुण प्रत्येक मनुष्य में होता है ,बस उस गुण को कर्मों में ढालने की आवश्यकता है। और हाँ! केवल मानव ही ऐसा कर सकता है।
तो मनुष्य को चाहिए कि अपने स्वभाव को मृदु और सर्वप्रिय बनाये रखने के लिए सदा सद्गुण को अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहिए। दूसरों को सुख देने के लिए सहे गए कष्ट भी सुखदायी ही होते हैं। आपके भीतर सहनशक्ति है, आत्मविश्वास है, सत्य के प्रति प्रेम है, चेहरे पर मधुर मुस्कान रहती है और सेवा के लिए आप आलस्य से रहित होकर प्रत्येक क्षण तैयार रहते हैं तो दिव्यता आपके स्वभाव में प्रवेश कर जाती है और दिव्यगुणसम्पन्न व्यक्ति का प्रत्येक स्थान पर सम्मान होता है। अपने आप को थोड़ा सा बदल कर देखिये; आप विश्वपरिवर्तन के अग्रणी बन जाएंगे।

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