पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥
भावार्थ : भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है॥10॥
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥
भावार्थ : इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें॥11॥
दुराचारी भी सदाचारी के समर्थन पर ही उछलता है।अन्यथा दुर्योधन युद्धभूमि में मामा शकुनी की सुरक्षा पहले करता किन्तु वह ऐसा नही करता क्योंकि वह जानता है कि भीष्म दृढ संकल्पी है अतः उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है। भीष्म का संकल्प जीवन भर किसी भी आतप से टूट न सका था। जीवन में कितने दबाव और झंझावात आये किन्तु भीष्म को न तोड़ सके। अम्बा जैसी सुंदर राजकुमारी भीष्म के संकल्प को तुड़वाने के लिए सभी तरह के दबाव बनाने में सफल रही। उसने राजा विचित्रवीर्य से गुहार लगाई, गुरुश्रेष्ठ परशुराम से गुहार लगाई किन्तु गुरु जिनकी इच्छामात्र भीष्म के लिए आदेश से कम न थी उनका दबाव भी भीष्म को प्रभावित न कर सका। यद्यपि परिणाम यह हुआ कि भीष्म को अपने ही गुरु परशुराम से युद्ध भी करना पड़ा ।भीष्म को धर्म में अटूट विश्वास था और धर्म यही तो है कि अपने संकल्पों को सिमित करो और फिर उन पर अडिग रहो। सनातन धर्म की यही शक्ति भीष्म को इतना दृढ बना चुकी थी कि वह योगिराज श्रीकृष्ण की तरह निद्राजीत ही नही रह गए थे अपितु उससे भी एक डग आगे मृत्युंजय हो गए थे।
यही वह पराक्रम था जिसने भीष्म ने स्वयं से लड़े सभी युद्धों में विजय प्राप्त कर ली थी और अब उस महावीर के लिए वाह्य युद्ध और शान्ति सम हो गयी थी। उनका प्रबुद्ध मस्तिष्क जानता था कि जो उनके लिए समस्थिति है वह साधारण मानवों के लिए बड़ी दुःखद स्थिति है इसलिए श्रीकृष्ण की भाँति युद्ध रुकवाने के लिए भी उन्होंने अथक प्रयास किये। ये सब बातें युद्ध न रोक पाने के बावजूद भी उन्हें महान एवं श्रद्धेय बना देती है। दुर्योधन भी इस बात को नकार नही सकता था । इसीलिए तो वह ये जानते हुए भी कि भीष्म कौरव और पाण्डव दोनों को समान प्यार करते है और वे युद्ध में पांडवों का वध नही करेंगे वह गुरु द्रोण को चारों और से भीष्म को सुरक्षित करने का आग्रह करता है।महापुरुष जीवित रहते हुए तो अपने कर्मों से अपने समाज को हर प्रकार का सुख प्रदान करते ही है किंतु मृत्यु के बाद भी सदियों सहस्त्राब्दियों तक पीढ़ियों के प्रेरणास्रोत बनकर सुख की वर्षा करते रहते है। भीष्म का जीवन भी ऐसा ही था जिसने हमे सिखाया कि विकल्पों के जीवन से निकलकर संकल्प का जीवन चुनों और जो संकल्प आपने एक बार ले लिया भले ही वह आपके स्वभाव से सुमेलित न हो किन्तु उसी पर अडिग रहो तो सफलताएं आपके प्राँगण में विराजकर स्वयं को गौरान्वित अनुभव करेंगी।

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